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"खरीदे" और "होल्ड"करे
25th=second pat
कई बार पूरा बाजार ही प्रचलन से दूर हो जाता है और विदेशी निवेशक या स्थानीय निवेशक किसी बाजार या शेयरों में दिलचस्पी लेना बंद कर देते है। बाजार के रुख में ऐसा बदलाव,बाजारों में वर्षो तक स्थिरता या गिरावट के कारण हो सकता है।
यदि आपने कोई शेयर,प्रबन्धन के प्रति सम्मान के कारण खरीदे है तो ऐसे शेयरों को "होल्ड" करके न रखे,यदि वे ऊपर उठने में सक्षम नही हो पाते है तो। सम्मान एक व्यक्तिगत राय है और यह आवश्यक नही की बाजार कंपनी के प्रबंधन के प्रति आपके उत्साह को साझा करें।
" बुल-मार्किट" ऐसी कंपनियों को भी पैदा कर सकती है जो केवल अतिरिक्त पूंजी की उपलब्धता का दावा कर सकती हैं, जो उनके अक्षम विकास और बीमार योजनाओ को पोषित कर सकती है। इस प्रकार के शेयर अपनी कीमतों को दुबारा से सन्तुलन बिठाएंगे जो 'बुल-मार्किट" में बहुत नीचे कारोबार कर रहे थे और दुबारा कभी भी भरपाई नही कर पाए।
आप वे शेयर अवश्य बेंच दे,जहां प्रबन्धन अपने व्यापार से अपना ध्यान खोने लगे है। उदाहरण के लिए एक एस, यू,वी, निर्माता को ही लें जो स्कूटर या मोटर सायकिल बनाता हैं।उनके पास क्या क्षमता है ? इन दोनों कारोबारों में कुछ भी समानता नही है सिवाय परिवहन क्षेत्र के। उनके ग्राहक अलग-अलग है,उनके बिक्री और सेवा केंद्र अलग-अलग है और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इन दोनों कारोबारों में बिल्कुल अलग तरह की मनःस्थितियों की आवश्यकता होती है। या एक यात्री कार कंपनी का उदाहरण ले जो ट्रक बनाना शुरू कर देती है। क्यो? वे क्या सोचते है कि उन्हें ट्रक के खरीदारों के सम्बंध में कोई जानकारी है जो उन्हें ट्रक निर्माण के कारोबार में पहले से स्थापित कंपनियों पर बढ़त दिलाती
है ?
"दीर्घकाल" अब कम से कमतर अवधि बनता जा रहा है। फोर्ड या जी, ई, को यहां तक अपने आने के लिए लगभग सौ वर्ष लग गए और गूगल या स्टारबक्स को वही तक पहुचने के लिए 10 वर्ष लगे। कंपनियां वैयक्तिक प्रौधोगिकी या पूंजी के आधार पर जीवित बची हुई है। दोनों चीजे कुछ कारोबारों की रक्षा नही कर पाती। यह कठिन से कठिनतर होता जा रहा है कि हम ऐसी कंपनियों को ढूंढे जो लंबे समय के दौरान अपनी बढ़त को बनाए रखने में सफल रही है।
ऐसे परिदृश्य में,"दीर्घकालीन" अवधि 2-3 वर्ष तक ही है। और यदि आप कंपनी को पिछड़ता देखते है तो इसका कारण है प्रबंधन या प्रतियोगिता या कोई भी कारण हो इसे स्वीकार करे और शेयर बेंच दे। बेशक वे खरीद के समय आपके पसंदीदा शेयर रहे हो।
बाजार पर विजय पाने का तरीका है उसकी "टाइमिंग" करना लगभग हमारा सारा समय,खरीद के निर्णय में ही चला जाता है और हम बिक्री के निर्णय को समय ही नही देते ( बिक्री के निर्णय अक्सर आवेगों, नकदी की आवश्यकता आदि से पैदा होते है )। अगर हम बिक्री के निर्णय को समय दे तो निश्चय ही इसका लाभ हमे तत्काल प्राप्त होगा।
केवल दो प्रकार के मूल्य ही महत्वपूर्ण होते है।एक तो आपका क्रय मूल्य और दूसरा विक्रय मूल्य सब तो शोर गुल के इलावा कुछ नही।
"बाजार" की "टाइमिंग" न करे, यह एक मिथक है। हालांकि निवेशको ( कारोबारियों के लिए नही ) के लिए,बाजार को कुछ दिनों के लिए या फिर एक महीने के लिए "टाइमिंग" करना मददगार साबित नही होता,लेकिन "बाजारों कि ""टाइमिंग"करना संरचनात्मक बदलाव पर आधारित होना चाहिए। विशेष रूप से यह उभरते हुए बाजारों के लिए सच है।
मंदी बाजारों में अधिकांश शेयरों में गिरावट होगी और तेज बाजारों में उनमे वृद्धि होगी। अंदरूनी सूत्र,बाजार की दिशा,गति व कमोडिटी-चक्र के लिए संरचनात्मक बदलावों को देखते है और उससे लाभ कमाते है।
तेज बाजारों में,एक अद्भुत घटना होती है। अधिकांश निवेशक बाजार की दिशा का सही अनुमान लगते है।जब बाजार में अधिक मूल्यांकन की स्थिति आरम्भ होती है तो चतुर निवेशक जिन्हें बाजार के बारे में पर्याप्त ज्ञान है, शेयर बेचना शुरू कर देते है।यह सोच कर की बाजार में गिरावट होगी। वे बुरी तरह से इस जल में फंस सकते है और सट्टेबाजी ( बल्कि"ऐज"फंड और संस्थागत निवेशक भी ) "भीड़" की लालच की सहायता से शेयरों की कीमतों को उठाना जारी रखते है। फंड-प्रबन्धक भी बाजारों को ऊपर उठाते है क्योंकि बुल मार्किट में वे एक बड़ी रक्कम प्राप्त कर चुके होते है।

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