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ऑनलाइन शेयर ट्रेडिंग
स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेडिंग के कई तरीके है।
हालांकि ट्रेडिंग की एक सुनिशिचत प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में कई सारे लोग भाग लेते है। खरीदार अपने ब्रोकर से जुड़ा होता है और ब्रोकर का लिंक स्टॉक एक्सचेंज के साथ होता है। इसी प्रकार इस ट्रांजेक्शन के दूसरी तरफ बिक्रीकर्ता अपने ब्रोकर के द्वारा एक्सचेंज से जुड़ा होता है।
स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन जाता है,जहाँ सभी एक साथ इकठ्ठे हो जाते है और उस जगह पर डिमांड तथा सप्लाई का मिलान होता है और खरीद-बिक्री होती है। आधुनिक तकनीक के आ जाने से स्टॉक मार्केट में होनेवाले लेन-देन के तरीके में भी कॉफी बदलाव आया है।
एक्सचेंज के द्वारा होनेवाली ट्रेडिंग के फायदे
पारदर्शिता
स्टॉक एक्सचेंज द्वारा ट्रेडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है। निवेशक कंप्यूटर स्क्रीन पर शेयर की सबसे उचित कीमत पर खरीद व बिक्री की प्रक्रिया का निपटान स्वयं करता है। निवेशक को कंप्यूटर स्क्रीन पर मार्केट में चल रही शेयर की कीमत पल-पल में मिलती है और वह जिस कीमत पर जितने शेयर खरीदना या बेचना चाहता है,उस कीमत व शेयरो की संख्या को कोड कर आर्डर प्लेस कर सकता है और शेयर की खरीद व बिक्री अपनी इच्छानुसार कर सकता है। उदा हरण के लिए यदि निवेशक को 100 शेयर एन, टी,पी,सी, के लेने है और उस शेयर का उस समय बाजार भाव 90 रुपये प्रति शेयर है तथा उस समय निवेशक यदि यह तय करता है कि उसे इस भाव मे लेने है,तो शेयरो की संख्या व भाव का उल्लेख कर शेयरो की खरीद कर सकता है। आर्डर एग्जीक्यूट होने के बाद कंप्यूटर पर पता चल जाता है कि उसके कितने शेयर किस कीमत पर मिले है। यदि 'लिमिट आर्डर' नही दिया है और 'मार्केट आर्डर' पर शेयरो की खरीद व बिक्री की गई है तो आपके द्वारा आर्डर दिए जाने के बाद आपको जिस बाजार पर शेयर की बिक्री या खरीद हुई है,उसका पूरा उल्लेख कंप्यूटर स्किन पर तुरन्त आ जाता है। यदि ट्रेड 90 रुपये 70 पैसे में हुई है तो आपको वह सही कीमत पता चलती है। इसलिए शेयर की कीमत के बारे में निवेशक बिल्कुल निश्चित रह सकता है।कीमत को लेकर उसे धोखा होना नामुमकिन होता है।
प्रमाण
इस बात का निश्चित प्रमाण आपके पास होता है कि आपके द्वारा किया गया ट्रांजेक्शन किस तरह हुआ। लेन-देन का पूरा रिकार्ड आपके पास होता है,इसीलिए आपको कल कोई पार्टी यह नही कह सकती कि ट्रांजेक्शन ( लेन-देन) नही हुआ था।
आय करो का कम होना
जब शेयरो का लेन-देन ( ट्रांजेक्शन ) देश के प्रमुख एक्सचेंजो में होता है,तब आयकर की दर कॉफी न्यूनतम होती है। जहाँ लम्बी अवधि में हुए पूजी लाभ ( लांग टर्म कैपिटल गेन ) पर किसी तरह का टैक्स ( कर) नही लगता है,वही कम अवधि में हुए पूंजी लाभ ( शार्ट टर्म कैपिटल गेन ) पर 15% की दर से आयकर निवेशक को देना होता है। गौरतलब है कि पहले शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स 10% था,जिसे वर्ष 2008 के बजटीय प्रावधान में 15% कर दिया गया।
शेयर बाजार में निवेश के माध्यम
शेयर बाजार में निवेश करने के कई रास्ते है तथा निवेशक को इन विभिन्न रास्तो की जानकारी होनी चाहिए, ताकि इन रास्तो से जुड़े जोखिम को भाँपकर वह अपने लिए योग्य रास्ता अपना सके।
मार्केट सेगमेंट
एक सामान्य निवेशक शेयर बाजार में केस सेगमेंट के माध्यम से निवेश करता है। अर्थात जब कभी वह शेयर खरीदता है तो उसे शेयरो का खरीद-मूल्य सेटलमेंट सायकिल की अवधि में चुकाना पड़ता है। शेयरो की ट्रेडिंग का दूसरा तरीका "मार्जिन सिस्टम" है।
इसमे शेयर ब्रोकर अपने ग्राहक को मार्जिन मनी पर ट्रेडिंग करने की सुविधा प्रदान करता है।इस प्रकार की ट्रेडिंग में निवेशक को शेयरो की खरीद का पूरा मूल्य नही चुकाना होता,अपितु आंशिक मूल्य ( उदाहरण के तौर पर 30%) ही चुकाना वह पूरी ट्रेडिंग का लाभ उठा सकता है। इस आंशिक मूल्य से ऊपर की राशि शेयर ब्रोकर वहन करता है। इस विधि में कोई निवेशक अपनी आर्थिक क्षमता से कई गुना अधिक आकर के निवेश से जुड़कर लाभ कमा सकता है।
ट्रेडिंग का पारंपरिक तरीक़ा
पारंपरिक तरीके में खरीदार तथा बिक्रीकर्ता के बीच मे शेयर दलाल माध्यम का काम करता है। निवेशक शेयर ब्रोकर के पास अपना एकाउंट खोलना है, जिसके साथ वह ट्रेडिंग करेगा। जब कभी ट्रांजेक्शन की आवश्यकता होती है,तब निवेशक शेयर दलाल को फोन करता है तथा अपना एकाउंट नंबर बताकर खरीद-फरोख्त का आर्डर प्रस्तुत करता है। ट्रांजेक्शन पूरा होने पर शेअर ब्रोकर "कॉन्ट्रक्ट नोट" तथा निर्धारित रकम का बिल बनाता है। निवेशक चेक के माध्यम से यह रकम शेयर ब्रोकर अदा करता है। इस प्रक्रिया को "पे-इन" सिस्टम कहते है। इसके पश्चात खरीदे गए शेयर पे-आउट तारीख से पहले ब्रोकर के खाते में दर्ज कर दिए जाते है। इस प्रक्रिया में निवेशक को शेयर ब्रोकर के पास उपस्थित रहना अनिवार्य होता है,ताकि वह सारी प्रक्रिया को स्वयं देख सके तथा आनेवाली किसी समस्या का निवारण तुरन्त किया जा सके।
ट्रेडिंग के पारंपरिक तरीके से लाभ
(१)..आसान तरीका।
(२).. आमने-सामने तथा विस्वास होने पर फोन पर ट्रेडिंग की जा सकती है।
(३)..लचीलापन--नकदी की उपलब्धता संबन्धी छोटी-मोटी समस्याये आपसी विस्वास से निपटाई जा सकती है।
(४)..शेयर दलाल से अतिरिक्त जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है।
(५).. इसमे शेयर दलाल का निवेशक से सीधा संपर्क रहता है।
पांरपरिक तरीके के नुकसान
(१).. निवेशक को स्वयं या अपने प्रति निधि को ट्रांजेक्शन के दौरान उपस्थित रहना अनिवार्य है।
(२).. इस वजह से निवेशक को परेसानी होती है।
ट्रेडिंग का ऑनलाइन तरीका
इस तरीके से निवेशक द्वारा शेयरो की ट्रेडिंग ब्रोकर के माध्यम से ही कि जाति है। यधपि ऑनलाइन ट्रेडिंग में ब्रोकर अदृश्य रहता है तथा इसका कोई नाम या पहचान नही होती । ऑनलाइन ट्रेडिंग में ब्रोकर की भूमिका इंटरनेट तथा अन्य सिस्टम,जो वेबसाइटे के माध्यम से कार्य करते है,ने ले ली है। इस प्रकार पारंपरिक तरीके से अलग ऑनलाइन ट्रेडिंग में कुछ बदलाव आ गया है तथा इसमे निवेशक का अनुभव भी पूर्णतः अलग रहता है।
इसमे ब्रोकर की वेबसाइट पर निवेशक को रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है।तथा उसके नाम से ऑनलाइन ट्रेडिंग एकाउंट खोल जाता है। जब कभी निवेशक को ट्रांजेक्शन ( ट्रेडिंग ) करनी होती है, वह ब्रोकर की वेबसाइट पर अपना नाम तथा पासवर्ड डालकर ब्रोकर की वेबसाइट के ट्रेडिंग पेज पर अपनी निर्धारित खरीद-बिक्री दर्ज करते है। इसमें मार्केट आर्डर तथा लिमिट आर्डर दोनों सुविधाए उपलब्ध होती है। निवेशक के खाते में आवश्यक धन जमा रहने पर तथा पासवर्ड सही होने पर यह ट्रांजेक्शन बाजार में मान्य हो जाता है।
निवेशक के खाते में से शेयरो का खरीद मूल्य एवं ब्रोकर का कमीशन निकल जाता है तथा उसके डी-मैट खाते में खरीदे गए शेयर जमा हो जाते है। शेयरो की बिक्री की अवस्था मे निवेशक के डी-मैट खाते से शेअर स्थानांतरित हो जाते है तथा उसके बैंक एकाउंट में शेयरो का बिक्री मूल्य कमीशन घटाकर दर्ज हो जाता है।
ऑनलाइन ट्रेडिंग के फायदे://
(१). निवेशक अपने समय व सुविधानुसार ट्रान्जेक्शन कर सकता है।
(२).. निवेशक को शारीरिक रूप से उपस्थित रहने की जरूरत नही होती।
(३)..फॉर्म आदि भरने की प्रक्रिया से मुक्ति मिलती है। निवेशक के लिए प्राथमिक बाजार तथा व्दितियक बाजार में निवेश बहुत आसान व सरल होता है।
(४).. गलती की संभावना नगण्य होती है।
नुकसान://
(१).. आपका एकाउंट हैकर्स द्वारा हैक किया जा सकता है।
(२).. जो लोग कंप्यूटर व इंटरनेट से अवगत नही है, वे इस पध्दति का लाभ नही उठा सकते है।
(३).. इलेक्ट्रॉनिक गति से ट्रांजेक्शन होने के कारण निवेशक को अपना निर्णय बदलने की सुविधा नही होती है।
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ऑनलाइन शेयर ट्रेडिंग
स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेडिंग के कई तरीके है।
हालांकि ट्रेडिंग की एक सुनिशिचत प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में कई सारे लोग भाग लेते है। खरीदार अपने ब्रोकर से जुड़ा होता है और ब्रोकर का लिंक स्टॉक एक्सचेंज के साथ होता है। इसी प्रकार इस ट्रांजेक्शन के दूसरी तरफ बिक्रीकर्ता अपने ब्रोकर के द्वारा एक्सचेंज से जुड़ा होता है।
स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन जाता है,जहाँ सभी एक साथ इकठ्ठे हो जाते है और उस जगह पर डिमांड तथा सप्लाई का मिलान होता है और खरीद-बिक्री होती है। आधुनिक तकनीक के आ जाने से स्टॉक मार्केट में होनेवाले लेन-देन के तरीके में भी कॉफी बदलाव आया है।
एक्सचेंज के द्वारा होनेवाली ट्रेडिंग के फायदे
पारदर्शिता
स्टॉक एक्सचेंज द्वारा ट्रेडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है। निवेशक कंप्यूटर स्क्रीन पर शेयर की सबसे उचित कीमत पर खरीद व बिक्री की प्रक्रिया का निपटान स्वयं करता है। निवेशक को कंप्यूटर स्क्रीन पर मार्केट में चल रही शेयर की कीमत पल-पल में मिलती है और वह जिस कीमत पर जितने शेयर खरीदना या बेचना चाहता है,उस कीमत व शेयरो की संख्या को कोड कर आर्डर प्लेस कर सकता है और शेयर की खरीद व बिक्री अपनी इच्छानुसार कर सकता है। उदा हरण के लिए यदि निवेशक को 100 शेयर एन, टी,पी,सी, के लेने है और उस शेयर का उस समय बाजार भाव 90 रुपये प्रति शेयर है तथा उस समय निवेशक यदि यह तय करता है कि उसे इस भाव मे लेने है,तो शेयरो की संख्या व भाव का उल्लेख कर शेयरो की खरीद कर सकता है। आर्डर एग्जीक्यूट होने के बाद कंप्यूटर पर पता चल जाता है कि उसके कितने शेयर किस कीमत पर मिले है। यदि 'लिमिट आर्डर' नही दिया है और 'मार्केट आर्डर' पर शेयरो की खरीद व बिक्री की गई है तो आपके द्वारा आर्डर दिए जाने के बाद आपको जिस बाजार पर शेयर की बिक्री या खरीद हुई है,उसका पूरा उल्लेख कंप्यूटर स्किन पर तुरन्त आ जाता है। यदि ट्रेड 90 रुपये 70 पैसे में हुई है तो आपको वह सही कीमत पता चलती है। इसलिए शेयर की कीमत के बारे में निवेशक बिल्कुल निश्चित रह सकता है।कीमत को लेकर उसे धोखा होना नामुमकिन होता है।
प्रमाण
इस बात का निश्चित प्रमाण आपके पास होता है कि आपके द्वारा किया गया ट्रांजेक्शन किस तरह हुआ। लेन-देन का पूरा रिकार्ड आपके पास होता है,इसीलिए आपको कल कोई पार्टी यह नही कह सकती कि ट्रांजेक्शन ( लेन-देन) नही हुआ था।
आय करो का कम होना
जब शेयरो का लेन-देन ( ट्रांजेक्शन ) देश के प्रमुख एक्सचेंजो में होता है,तब आयकर की दर कॉफी न्यूनतम होती है। जहाँ लम्बी अवधि में हुए पूजी लाभ ( लांग टर्म कैपिटल गेन ) पर किसी तरह का टैक्स ( कर) नही लगता है,वही कम अवधि में हुए पूंजी लाभ ( शार्ट टर्म कैपिटल गेन ) पर 15% की दर से आयकर निवेशक को देना होता है। गौरतलब है कि पहले शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स 10% था,जिसे वर्ष 2008 के बजटीय प्रावधान में 15% कर दिया गया।
शेयर बाजार में निवेश के माध्यम
शेयर बाजार में निवेश करने के कई रास्ते है तथा निवेशक को इन विभिन्न रास्तो की जानकारी होनी चाहिए, ताकि इन रास्तो से जुड़े जोखिम को भाँपकर वह अपने लिए योग्य रास्ता अपना सके।
मार्केट सेगमेंट
एक सामान्य निवेशक शेयर बाजार में केस सेगमेंट के माध्यम से निवेश करता है। अर्थात जब कभी वह शेयर खरीदता है तो उसे शेयरो का खरीद-मूल्य सेटलमेंट सायकिल की अवधि में चुकाना पड़ता है। शेयरो की ट्रेडिंग का दूसरा तरीका "मार्जिन सिस्टम" है।
इसमे शेयर ब्रोकर अपने ग्राहक को मार्जिन मनी पर ट्रेडिंग करने की सुविधा प्रदान करता है।इस प्रकार की ट्रेडिंग में निवेशक को शेयरो की खरीद का पूरा मूल्य नही चुकाना होता,अपितु आंशिक मूल्य ( उदाहरण के तौर पर 30%) ही चुकाना वह पूरी ट्रेडिंग का लाभ उठा सकता है। इस आंशिक मूल्य से ऊपर की राशि शेयर ब्रोकर वहन करता है। इस विधि में कोई निवेशक अपनी आर्थिक क्षमता से कई गुना अधिक आकर के निवेश से जुड़कर लाभ कमा सकता है।
ट्रेडिंग का पारंपरिक तरीक़ा
पारंपरिक तरीके में खरीदार तथा बिक्रीकर्ता के बीच मे शेयर दलाल माध्यम का काम करता है। निवेशक शेयर ब्रोकर के पास अपना एकाउंट खोलना है, जिसके साथ वह ट्रेडिंग करेगा। जब कभी ट्रांजेक्शन की आवश्यकता होती है,तब निवेशक शेयर दलाल को फोन करता है तथा अपना एकाउंट नंबर बताकर खरीद-फरोख्त का आर्डर प्रस्तुत करता है। ट्रांजेक्शन पूरा होने पर शेअर ब्रोकर "कॉन्ट्रक्ट नोट" तथा निर्धारित रकम का बिल बनाता है। निवेशक चेक के माध्यम से यह रकम शेयर ब्रोकर अदा करता है। इस प्रक्रिया को "पे-इन" सिस्टम कहते है। इसके पश्चात खरीदे गए शेयर पे-आउट तारीख से पहले ब्रोकर के खाते में दर्ज कर दिए जाते है। इस प्रक्रिया में निवेशक को शेयर ब्रोकर के पास उपस्थित रहना अनिवार्य होता है,ताकि वह सारी प्रक्रिया को स्वयं देख सके तथा आनेवाली किसी समस्या का निवारण तुरन्त किया जा सके।
ट्रेडिंग के पारंपरिक तरीके से लाभ
(१)..आसान तरीका।
(२).. आमने-सामने तथा विस्वास होने पर फोन पर ट्रेडिंग की जा सकती है।
(३)..लचीलापन--नकदी की उपलब्धता संबन्धी छोटी-मोटी समस्याये आपसी विस्वास से निपटाई जा सकती है।
(४)..शेयर दलाल से अतिरिक्त जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है।
(५).. इसमे शेयर दलाल का निवेशक से सीधा संपर्क रहता है।
पांरपरिक तरीके के नुकसान
(१).. निवेशक को स्वयं या अपने प्रति निधि को ट्रांजेक्शन के दौरान उपस्थित रहना अनिवार्य है।
(२).. इस वजह से निवेशक को परेसानी होती है।
ट्रेडिंग का ऑनलाइन तरीका
इस तरीके से निवेशक द्वारा शेयरो की ट्रेडिंग ब्रोकर के माध्यम से ही कि जाति है। यधपि ऑनलाइन ट्रेडिंग में ब्रोकर अदृश्य रहता है तथा इसका कोई नाम या पहचान नही होती । ऑनलाइन ट्रेडिंग में ब्रोकर की भूमिका इंटरनेट तथा अन्य सिस्टम,जो वेबसाइटे के माध्यम से कार्य करते है,ने ले ली है। इस प्रकार पारंपरिक तरीके से अलग ऑनलाइन ट्रेडिंग में कुछ बदलाव आ गया है तथा इसमे निवेशक का अनुभव भी पूर्णतः अलग रहता है।
इसमे ब्रोकर की वेबसाइट पर निवेशक को रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है।तथा उसके नाम से ऑनलाइन ट्रेडिंग एकाउंट खोल जाता है। जब कभी निवेशक को ट्रांजेक्शन ( ट्रेडिंग ) करनी होती है, वह ब्रोकर की वेबसाइट पर अपना नाम तथा पासवर्ड डालकर ब्रोकर की वेबसाइट के ट्रेडिंग पेज पर अपनी निर्धारित खरीद-बिक्री दर्ज करते है। इसमें मार्केट आर्डर तथा लिमिट आर्डर दोनों सुविधाए उपलब्ध होती है। निवेशक के खाते में आवश्यक धन जमा रहने पर तथा पासवर्ड सही होने पर यह ट्रांजेक्शन बाजार में मान्य हो जाता है।
निवेशक के खाते में से शेयरो का खरीद मूल्य एवं ब्रोकर का कमीशन निकल जाता है तथा उसके डी-मैट खाते में खरीदे गए शेयर जमा हो जाते है। शेयरो की बिक्री की अवस्था मे निवेशक के डी-मैट खाते से शेअर स्थानांतरित हो जाते है तथा उसके बैंक एकाउंट में शेयरो का बिक्री मूल्य कमीशन घटाकर दर्ज हो जाता है।
ऑनलाइन ट्रेडिंग के फायदे://
(१). निवेशक अपने समय व सुविधानुसार ट्रान्जेक्शन कर सकता है।
(२).. निवेशक को शारीरिक रूप से उपस्थित रहने की जरूरत नही होती।
(३)..फॉर्म आदि भरने की प्रक्रिया से मुक्ति मिलती है। निवेशक के लिए प्राथमिक बाजार तथा व्दितियक बाजार में निवेश बहुत आसान व सरल होता है।
(४).. गलती की संभावना नगण्य होती है।
नुकसान://
(१).. आपका एकाउंट हैकर्स द्वारा हैक किया जा सकता है।
(२).. जो लोग कंप्यूटर व इंटरनेट से अवगत नही है, वे इस पध्दति का लाभ नही उठा सकते है।
(३).. इलेक्ट्रॉनिक गति से ट्रांजेक्शन होने के कारण निवेशक को अपना निर्णय बदलने की सुविधा नही होती है।

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