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शेयरो की ट्रेडिंग टिप्स
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शेयरो की ट्रेडिंग वह सबसे महत्वपूर्ण कारक है,जो निवेशको को शेयरो की तरफ आकर्षित करता है। शेयर बाजार ( स्टॉक मार्केट ) में निवेश को अनुभूति तथा बाजार में आय उतार-चढ़ाव की स्थिति बहुत सारे लोगो को निवेश के इस तरीके की तरफ आकर्षित करती है। कई लोगो को इस क्षेत्र से जुड़ी आय ( रिटर्न) के साथ-साथ इस पूरी प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अनुभव भी आनद देता है।
स्टॉक एक्सचेंज://
स्टॉक एक्सचेंज एक माध्यम है, जिसकी सहायता से शेयरो या सेक्युरिटिज की खरीद-फरोख्त( ट्रेडिंग) की जाती है। पहले स्टॉक एक्सचेंज एक निधार्रित स्थान या भवन के रूप में होता था, जहाँ शेयर दलाल ( ब्रोकर्स) आमने-सामने आकर शेयरो की ट्रेडिंग करते थे। उस समय "ट्रेडिंग रिग" होती है, जहाँ शेयरो के सौदों का निपटान होता था। सूचना तकनीक के इस दौर में स्टॉक एक्सचेंज की कार्य-प्रणाली में आमूलचूल बदलाव आ गया है। अब स्टॉक एक्सचेंज का स्वरूप आभारी ( वर्चुअल) बन चुका है। स्टॉक एक्सचेंज का प्रत्येक "सदस्य ब्रोकर" ट्रेडिंग टर्मिनल द्वारा सेंट्रल प्लेस से जुड़ा होता है, जहाँ शेयरों को खरीद-फरोख्त के ऑर्डर का मिलान करके सौदे निपटाए जाते है। उदाहरण के तौर पर,हैदराबाद में बैठा एक व्यक्ति कानपुर में बैठे व्यक्ति के साथ "ट्रेडिंग टर्मिनल" के माध्यम से शेयरो के सौदे कर सकता है। ये ट्रेडिंग टर्मिनल सेटेलाइट तथा दूसरे संचार माध्यमो द्वारा एक-दूसरे से तथा स्टॉक एक्सचेंज के सेंट्रल प्लेस से जुड़े होते है। आजकल सभी स्टॉक एक्सचेंज में शेयरो की खरीद-फरोख्त ( बाइंग-सेलिंग) आदेश ( आर्डर) प्रस्तुत करने के लिए स्वचालित प्रणालियाँ ( ऑटोमेटेड सिस्टम्स) है। निवेशक को अपने ब्रोकर के माध्यम से किसी शेयर की खरीद अथवा बिक्री का आदेश ( आर्डर) प्रस्तुत करना होता है। यह आदेश ब्रोकर के ट्रेडिंग टर्मिनल द्वारा स्टॉक एक्सचेंज के टर्मिनल तक पहुचता है। वहाँ इस आर्डर का मिलान ( मैचिंग) अन्य टर्मिनलों से आए विभिन्न आर्डरों से किया जाता है। यहाँ स्टॉक एक्सचेंज की स्वचालित प्रणाली इस आर्डर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दूसरे आर्डर का मिलान करती है तथा खरीद-बिक्री का सौदा तय हो जाता है। उदाहरण के तौर पर,यदि एक निवेशक अपने ब्रोकर के टर्मिनल के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक के 100 शेयरो की खरीद का आदेश 2,000 रुपए प्रति शेयर की दर से प्रस्तुत (आर्डर प्लेस) करता है तो स्टॉक एक्सचेंज की स्वचालित प्रणाली इस आर्डर का मिलान भारतीय स्टेट बैंक के शेयरो की बिक्री के लिए आए अन्य आर्डरों से करता है। सर्वाधिक उपयुक्त आर्डर उपलब्ध होने पर इन दोनों आर्डर का सौदा तय कर दिया जाता है। शेयरो की खरीद-बिक्री के लिए दो तरह के ऑर्डर प्रस्तुत किए जा सकता है--पहला है "लिमिट आर्डर"और दूसरा है "मार्केट आर्डर"।
स्टॉक एक्सचेंज एक माध्यम है, जिसकी सहायता से शेयरो या सेक्युरिटिज की खरीद-फरोख्त( ट्रेडिंग) की जाती है। पहले स्टॉक एक्सचेंज एक निधार्रित स्थान या भवन के रूप में होता था, जहाँ शेयर दलाल ( ब्रोकर्स) आमने-सामने आकर शेयरो की ट्रेडिंग करते थे। उस समय "ट्रेडिंग रिग" होती है, जहाँ शेयरो के सौदों का निपटान होता था। सूचना तकनीक के इस दौर में स्टॉक एक्सचेंज की कार्य-प्रणाली में आमूलचूल बदलाव आ गया है। अब स्टॉक एक्सचेंज का स्वरूप आभारी ( वर्चुअल) बन चुका है। स्टॉक एक्सचेंज का प्रत्येक "सदस्य ब्रोकर" ट्रेडिंग टर्मिनल द्वारा सेंट्रल प्लेस से जुड़ा होता है, जहाँ शेयरों को खरीद-फरोख्त के ऑर्डर का मिलान करके सौदे निपटाए जाते है। उदाहरण के तौर पर,हैदराबाद में बैठा एक व्यक्ति कानपुर में बैठे व्यक्ति के साथ "ट्रेडिंग टर्मिनल" के माध्यम से शेयरो के सौदे कर सकता है। ये ट्रेडिंग टर्मिनल सेटेलाइट तथा दूसरे संचार माध्यमो द्वारा एक-दूसरे से तथा स्टॉक एक्सचेंज के सेंट्रल प्लेस से जुड़े होते है। आजकल सभी स्टॉक एक्सचेंज में शेयरो की खरीद-फरोख्त ( बाइंग-सेलिंग) आदेश ( आर्डर) प्रस्तुत करने के लिए स्वचालित प्रणालियाँ ( ऑटोमेटेड सिस्टम्स) है। निवेशक को अपने ब्रोकर के माध्यम से किसी शेयर की खरीद अथवा बिक्री का आदेश ( आर्डर) प्रस्तुत करना होता है। यह आदेश ब्रोकर के ट्रेडिंग टर्मिनल द्वारा स्टॉक एक्सचेंज के टर्मिनल तक पहुचता है। वहाँ इस आर्डर का मिलान ( मैचिंग) अन्य टर्मिनलों से आए विभिन्न आर्डरों से किया जाता है। यहाँ स्टॉक एक्सचेंज की स्वचालित प्रणाली इस आर्डर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दूसरे आर्डर का मिलान करती है तथा खरीद-बिक्री का सौदा तय हो जाता है। उदाहरण के तौर पर,यदि एक निवेशक अपने ब्रोकर के टर्मिनल के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक के 100 शेयरो की खरीद का आदेश 2,000 रुपए प्रति शेयर की दर से प्रस्तुत (आर्डर प्लेस) करता है तो स्टॉक एक्सचेंज की स्वचालित प्रणाली इस आर्डर का मिलान भारतीय स्टेट बैंक के शेयरो की बिक्री के लिए आए अन्य आर्डरों से करता है। सर्वाधिक उपयुक्त आर्डर उपलब्ध होने पर इन दोनों आर्डर का सौदा तय कर दिया जाता है। शेयरो की खरीद-बिक्री के लिए दो तरह के ऑर्डर प्रस्तुत किए जा सकता है--पहला है "लिमिट आर्डर"और दूसरा है "मार्केट आर्डर"।
लिमिट आर्डर://
शेयरो का सौदा करने के लिए ब्रोकर या सब-ब्रोकर को फोन द्वारा निर्देश देना होता है। यदि आप ऑनलाइन ट्रेडिंग कर रहे है तो आप स्वयं "आर्डर" या निर्देश को एग्जीक्यूट कर सकते है।
लिमिट आर्डर को "फिक्सड प्राइस आर्डर" भी कहते है। इस आर्डर ( निर्देश) में आप एक तय दाम पर ही शेयर खरीदने या बेचने के निर्देश देते है। आमतौर पर निवेशक ब्रोकर के कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखनेवाले शेयर के उस समय चल रहे भाव से थोड़ा ऊपर या थोड़ा नीचे ही यह दाम तय ( लिमिट निर्धारित) करते है। यानी यदि आप किसी पूर्व-निर्धारित दाम पर शेयर खरीदना या बेचना चाहते है तो भी लिमिट आर्डर का उपयोग कर सकते है। उदाहरण के लिए मान लीजिए,आपको एन, टी,पी,सी, के 100 शेयर 110 रुपए प्रति शेयर के भाव से खरीदने है,लेकिन उस समय एन, टी,पी,सी,का बाजार में 110 रुपए प्रति शेयर से ज्यादा का भाव चल रहा है लेकिन यदि यह अंतर इतना ज्यादा नही है और आपको लगता है कि 112 रुपए प्रति शेयर पर चल रहा एन, टी,पी,सी, का शेअर 110 रुपए में मिल सकता है तो आप उस शेयर की लिमिट प्राइस 110 रुपए प्रति शेयर के हिसाब सेआर्डर दे देते है आपके द्वारा किया गया यह निर्देश तब तक एग्जीक्यूट नही होगा,जब उस शेयर की मार्केट प्राइस ( बाजार कीमत ) 110 रुपए प्रति शेयर नही हो जाती। यदि उस दिन शेयर की प्राइस बाजार बंद होने तक 110 रुपए 50 पैसे तक कि हुई तो आपका शेयर खरीदने का आर्डर कैसिल हो जायेगा;क्योकि आपने 110 रुपए प्रति शेयर खरीदने का लिमिट आर्डर दिया हुआ था। इसी तरह शेयरो की बिक्री के लिए भी निर्देश का उपयोग किया जाता है।उदाहरण के लिए,आपको लगता है कि आपका एन, टी,पी, सी, का शेयर बाजार में चल रहे भाव से ज्यादा के भाव पर बिक सकता है और इस शेयर में आज उछाल आ सकता है तो आप बिक्री का निर्देश लिमिट आर्डर में देते है।
लिमिट आर्डर को "फिक्सड प्राइस आर्डर" भी कहते है। इस आर्डर ( निर्देश) में आप एक तय दाम पर ही शेयर खरीदने या बेचने के निर्देश देते है। आमतौर पर निवेशक ब्रोकर के कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखनेवाले शेयर के उस समय चल रहे भाव से थोड़ा ऊपर या थोड़ा नीचे ही यह दाम तय ( लिमिट निर्धारित) करते है। यानी यदि आप किसी पूर्व-निर्धारित दाम पर शेयर खरीदना या बेचना चाहते है तो भी लिमिट आर्डर का उपयोग कर सकते है। उदाहरण के लिए मान लीजिए,आपको एन, टी,पी,सी, के 100 शेयर 110 रुपए प्रति शेयर के भाव से खरीदने है,लेकिन उस समय एन, टी,पी,सी,का बाजार में 110 रुपए प्रति शेयर से ज्यादा का भाव चल रहा है लेकिन यदि यह अंतर इतना ज्यादा नही है और आपको लगता है कि 112 रुपए प्रति शेयर पर चल रहा एन, टी,पी,सी, का शेअर 110 रुपए में मिल सकता है तो आप उस शेयर की लिमिट प्राइस 110 रुपए प्रति शेयर के हिसाब सेआर्डर दे देते है आपके द्वारा किया गया यह निर्देश तब तक एग्जीक्यूट नही होगा,जब उस शेयर की मार्केट प्राइस ( बाजार कीमत ) 110 रुपए प्रति शेयर नही हो जाती। यदि उस दिन शेयर की प्राइस बाजार बंद होने तक 110 रुपए 50 पैसे तक कि हुई तो आपका शेयर खरीदने का आर्डर कैसिल हो जायेगा;क्योकि आपने 110 रुपए प्रति शेयर खरीदने का लिमिट आर्डर दिया हुआ था। इसी तरह शेयरो की बिक्री के लिए भी निर्देश का उपयोग किया जाता है।उदाहरण के लिए,आपको लगता है कि आपका एन, टी,पी, सी, का शेयर बाजार में चल रहे भाव से ज्यादा के भाव पर बिक सकता है और इस शेयर में आज उछाल आ सकता है तो आप बिक्री का निर्देश लिमिट आर्डर में देते है।
मार्केट आर्डर://
मार्केट आर्डर का उपयोग तब किया जाता है,जब आप ब्रोकर के कंप्यूटर स्क्रीन पर देखे गए बाजार भाव पर अपने शेयर खरीदना या बेचना चाहते है। उदाहरण के लिए मैन लीजिए,आप एन, टी,पी,सी के 100 शेयर खरीदने के लिए ब्रोकर को मार्केट आर्डर देते है। तब जैसी ही आपका आर्डर एग्जीक्यूट होगा,उस समय शेयर का जो भाव चल रहा होगा,उस रेट पर आपकी खरीदी हो जायेगी। किस मूल्य पर आपने शेयर खरीदा, यह बाइंग ( खरीदी ) आर्डर को एग्जीक्यूट करने के बाद कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देगा। इसके अलावा आपके फायदे के लिहाज से ब्रोकर आपकी सहमति से ऐसा भी कर सकता है। जैसे--अब मान लीजिए,कंप्यूटर आपको दिखता है कि बाजार में चल रहे 60 रुपये प्रति शेयर भाव पर केवल 80 शेयर उपलब्ध है और बेचनेवाले कुछ लोग 62 रुपये प्रति शेयर माँग रहे है। इस स्थिति में ब्रोकर आपके लिए 80 शेयर 60 रुपये प्रति शेयर और बाकी 20 शेयर 62 रुपये पर प्रति शेयर के दाम से खरीदेगा। इसलिए बाजार में बहुत उतार-चढ़ाव के समय या किसी बड़े सौदे के लिए मार्केट आर्डर का उपयोग न करे।इस आर्डर का उपयोग तभी करना उचित रहता है,जब आप जल्दी में कोई शेयर खरीदना या बेचना चाहते है और उस समय सौदे के भाव को लेकर आप ज्यादा चिंतित न हो देश मे मुख्यतः दो एक्सचेंज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ( बी,एस, ई, ) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( एन, एस, ई, ) में अधिकांश खरीद-फरोख्त "कैश सेग्मेंट" में होती है। नोंकेश सेग्मेंट, जिसमे डेरिवेटिव सौदे आते है,उसकी जानकारी आपको आगे के अध्याय में मिलेगी।
इसके अलावा एक और ऑर्डर है,जिसे "स्टॉक लॉस ऑर्डर" कहते है। इसका उपयोग हर उस निवेशक को करना चाहिए, जो "डे-ट्रेडिंग" करता है।
मार्केट आर्डर का उपयोग तब किया जाता है,जब आप ब्रोकर के कंप्यूटर स्क्रीन पर देखे गए बाजार भाव पर अपने शेयर खरीदना या बेचना चाहते है। उदाहरण के लिए मैन लीजिए,आप एन, टी,पी,सी के 100 शेयर खरीदने के लिए ब्रोकर को मार्केट आर्डर देते है। तब जैसी ही आपका आर्डर एग्जीक्यूट होगा,उस समय शेयर का जो भाव चल रहा होगा,उस रेट पर आपकी खरीदी हो जायेगी। किस मूल्य पर आपने शेयर खरीदा, यह बाइंग ( खरीदी ) आर्डर को एग्जीक्यूट करने के बाद कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देगा। इसके अलावा आपके फायदे के लिहाज से ब्रोकर आपकी सहमति से ऐसा भी कर सकता है। जैसे--अब मान लीजिए,कंप्यूटर आपको दिखता है कि बाजार में चल रहे 60 रुपये प्रति शेयर भाव पर केवल 80 शेयर उपलब्ध है और बेचनेवाले कुछ लोग 62 रुपये प्रति शेयर माँग रहे है। इस स्थिति में ब्रोकर आपके लिए 80 शेयर 60 रुपये प्रति शेयर और बाकी 20 शेयर 62 रुपये पर प्रति शेयर के दाम से खरीदेगा। इसलिए बाजार में बहुत उतार-चढ़ाव के समय या किसी बड़े सौदे के लिए मार्केट आर्डर का उपयोग न करे।इस आर्डर का उपयोग तभी करना उचित रहता है,जब आप जल्दी में कोई शेयर खरीदना या बेचना चाहते है और उस समय सौदे के भाव को लेकर आप ज्यादा चिंतित न हो देश मे मुख्यतः दो एक्सचेंज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ( बी,एस, ई, ) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( एन, एस, ई, ) में अधिकांश खरीद-फरोख्त "कैश सेग्मेंट" में होती है। नोंकेश सेग्मेंट, जिसमे डेरिवेटिव सौदे आते है,उसकी जानकारी आपको आगे के अध्याय में मिलेगी।
इसके अलावा एक और ऑर्डर है,जिसे "स्टॉक लॉस ऑर्डर" कहते है। इसका उपयोग हर उस निवेशक को करना चाहिए, जो "डे-ट्रेडिंग" करता है।
स्टॉप लॉस आर्डर://
निवेशक जो अपना नुकसान सीमित रखना चाहते है या पूर्व निर्धारित स्तर पर लाभ कमाने चाहते है,वे स्टॉप ऑर्डर का उपयोग करते है। वे निवेशक जिन्होंने शेयर खरीदे या बेचे है,पर बाजार के उलट दिशा में चलने की स्थिति में अपने नुकसान से बचना चाहते है। ऐसे में "स्टॉप लॉस ऑर्डर" की सहायता से वे अपना नुकसान सीमित कर सकते है।
बाजार में भारी अस्थिरता के समय यह ऑर्डर निवेशको को किसी बड़े नुकसान से बचा लेता है। यह ऑर्डर उन निवेशको के लिए भी लाभदायक है, जो शॉर्ट टर्म के लिए शेयरो का सौदा करते है,उन पर शेयर के बाजार भाव पर नजर नही रख पाते।
स्टॉप लॉस ऑर्डर में निवेशक एक दाम के साथ ब्रोकर के कंप्यूटर में एक अन्य दाम भी निर्धारित करता है, जिसे "ट्रिगर प्राइस"कहते है। जैसे ही बाजार में शेअर का भाव इस "ट्रिगर प्राइस" तक पहुँचता है,आपका आर्डर सक्रिय हो जाता है।यह "ट्रिगर प्राइस"ऑर्डर देते समय बाजार में चल रहे मूल्य से अधिक या कम होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक निवेशक ने 100 रुपए प्रति शेयर के मूल्य से एन, टी,पी,सी, के शेअर खरीदे। लेकिन वह यह नही जानता कि शेयर के दाम बढेगे या गिरेंगे। लेकिन वह चाहता है कि यदि शेयर की कीमत गिरे तो वह अपना नुकसान 10 रुपए प्रति शेयर तक सीमित रख सके। ऐसी स्थिति में निवेशक ये शेयर बेचने के लिए अपना स्टॉप लॉस ऑर्डर 90 रुपए प्रति शेयर पर दे सकता है और इसमें ट्रिगर प्राइस होगी 91 रुपए प्रति शेयर। अब जैसे ही शेयर का भाव गिरकर 91रुपए प्रति शेअर होगा,कंप्यूटर पर निवेशक का ऑर्डर सक्रिय हो जायेगा। पर यह लागू तभी होगा,जब भाव 90 रुपए प्रति शेयर पहुँच जायगा। इसी प्रकार यदि निवेशक कोई शेयर बेचता है,लेकिन उसे कम दाम पर खरीदना चाहता है,तब भी स्टॉप लॉस ऑर्डर का उपयोग कर सकता है। बहुत से बड़े निवेशक इस ऑर्डर का उपयोग तब करते है,जब उनके विश्लेशण के अनुसार एक पूर्व निर्धारित स्तर पर करने के बाद शेयर का भाव तेजी से बढ़ने या गिरने की संभावना हो।
यह ऑर्डर "डे-ट्रेडिंग" करनेवाले निवेशक तथा "इंट्रा-डे"में मार्जिन व मार्जिन प्लस में "इंट्रा-डे" के अंतर्गत निवेशक को खरीदी व बिक्री का निपटान उसी दिन बाजार बंद होने से पहले करना होता है तथा इसके लिए ब्रोकर अपने ग्राहक को "मार्जिन" व "मर्जिनप्लस" की सुविधा देते है,जिनके अंतर्गत निवेशक अपने मूल्य धन के 4 से 6 गुना अधिक राशि से शेयरो की खरीद-बिक्री कर सकता है। स्टॉप लॉस आर्डर डे ट्रेडिंग करने वाले निवेशको के लिए बहुत लाभदायक है; क्योकि उन्हें दिन बाजार बंद होने के पहले सौदा का निपटान करना होता है।
वह निवेशक जो यह सोचकर बाजार खुलने पर शेयर की खरीद करता है कि उसे उस शेयर की कीमत में होनेवाली बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा;लेकिन चुकी शेयर बाजार पर खबरों,वैश्विक स्थिति और माँग-आपूर्ति का बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है,इसलिए इन सम्भावनाओ को देखते हुए निवेशक शेयर खरीदने के साथ ही स्टॉप लॉस लगाने का आर्डर दे देता है कि यदि शेयर की कीमत इस सिमा तक नीचे चली जाए तो ये शेयर बिक जाय।इस प्रकार नुकसान की सीमा का निर्धारित निवेशक के हाथ मे होता है और यदि शेयर की कीमत बढ़ जाती है तथा आप शेयर ऊची कीमत पर बेच देते है तो स्टॉप लॉस आर्डर अपने आप ही निष्क्रिय हो जाता है।
निवेशक जो अपना नुकसान सीमित रखना चाहते है या पूर्व निर्धारित स्तर पर लाभ कमाने चाहते है,वे स्टॉप ऑर्डर का उपयोग करते है। वे निवेशक जिन्होंने शेयर खरीदे या बेचे है,पर बाजार के उलट दिशा में चलने की स्थिति में अपने नुकसान से बचना चाहते है। ऐसे में "स्टॉप लॉस ऑर्डर" की सहायता से वे अपना नुकसान सीमित कर सकते है।
बाजार में भारी अस्थिरता के समय यह ऑर्डर निवेशको को किसी बड़े नुकसान से बचा लेता है। यह ऑर्डर उन निवेशको के लिए भी लाभदायक है, जो शॉर्ट टर्म के लिए शेयरो का सौदा करते है,उन पर शेयर के बाजार भाव पर नजर नही रख पाते।
स्टॉप लॉस ऑर्डर में निवेशक एक दाम के साथ ब्रोकर के कंप्यूटर में एक अन्य दाम भी निर्धारित करता है, जिसे "ट्रिगर प्राइस"कहते है। जैसे ही बाजार में शेअर का भाव इस "ट्रिगर प्राइस" तक पहुँचता है,आपका आर्डर सक्रिय हो जाता है।यह "ट्रिगर प्राइस"ऑर्डर देते समय बाजार में चल रहे मूल्य से अधिक या कम होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक निवेशक ने 100 रुपए प्रति शेयर के मूल्य से एन, टी,पी,सी, के शेअर खरीदे। लेकिन वह यह नही जानता कि शेयर के दाम बढेगे या गिरेंगे। लेकिन वह चाहता है कि यदि शेयर की कीमत गिरे तो वह अपना नुकसान 10 रुपए प्रति शेयर तक सीमित रख सके। ऐसी स्थिति में निवेशक ये शेयर बेचने के लिए अपना स्टॉप लॉस ऑर्डर 90 रुपए प्रति शेयर पर दे सकता है और इसमें ट्रिगर प्राइस होगी 91 रुपए प्रति शेयर। अब जैसे ही शेयर का भाव गिरकर 91रुपए प्रति शेअर होगा,कंप्यूटर पर निवेशक का ऑर्डर सक्रिय हो जायेगा। पर यह लागू तभी होगा,जब भाव 90 रुपए प्रति शेयर पहुँच जायगा। इसी प्रकार यदि निवेशक कोई शेयर बेचता है,लेकिन उसे कम दाम पर खरीदना चाहता है,तब भी स्टॉप लॉस ऑर्डर का उपयोग कर सकता है। बहुत से बड़े निवेशक इस ऑर्डर का उपयोग तब करते है,जब उनके विश्लेशण के अनुसार एक पूर्व निर्धारित स्तर पर करने के बाद शेयर का भाव तेजी से बढ़ने या गिरने की संभावना हो।
यह ऑर्डर "डे-ट्रेडिंग" करनेवाले निवेशक तथा "इंट्रा-डे"में मार्जिन व मार्जिन प्लस में "इंट्रा-डे" के अंतर्गत निवेशक को खरीदी व बिक्री का निपटान उसी दिन बाजार बंद होने से पहले करना होता है तथा इसके लिए ब्रोकर अपने ग्राहक को "मार्जिन" व "मर्जिनप्लस" की सुविधा देते है,जिनके अंतर्गत निवेशक अपने मूल्य धन के 4 से 6 गुना अधिक राशि से शेयरो की खरीद-बिक्री कर सकता है। स्टॉप लॉस आर्डर डे ट्रेडिंग करने वाले निवेशको के लिए बहुत लाभदायक है; क्योकि उन्हें दिन बाजार बंद होने के पहले सौदा का निपटान करना होता है।
वह निवेशक जो यह सोचकर बाजार खुलने पर शेयर की खरीद करता है कि उसे उस शेयर की कीमत में होनेवाली बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा;लेकिन चुकी शेयर बाजार पर खबरों,वैश्विक स्थिति और माँग-आपूर्ति का बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है,इसलिए इन सम्भावनाओ को देखते हुए निवेशक शेयर खरीदने के साथ ही स्टॉप लॉस लगाने का आर्डर दे देता है कि यदि शेयर की कीमत इस सिमा तक नीचे चली जाए तो ये शेयर बिक जाय।इस प्रकार नुकसान की सीमा का निर्धारित निवेशक के हाथ मे होता है और यदि शेयर की कीमत बढ़ जाती है तथा आप शेयर ऊची कीमत पर बेच देते है तो स्टॉप लॉस आर्डर अपने आप ही निष्क्रिय हो जाता है।
लिवाली-बिकवाली://
शेयरो की खरीद व बिक्री "लिवाली-बिकवाली" ट्रेडिंग कहलाती है। कैसे यह प्रक्रिया हर निवेशक के लिए एक जैसी दिखती है,लेकिन अलग-अलग श्रेणी के निवेशको के लिए यह खरीद-फरोख्त कई मायनों में अलग होती है। इसमें सबसे बड़ा फर्क है "मात्रा" का
एक छोटा निवेशक किसी विशेष कंपनी के 50 से 100 शेअर खरीदेगा लेकिन इन शेयरो की खरीद का आंकड़ा तब बहुत ज्यादा होगा,जब इस कंपनी के शेयरो की खरीद "एच्,एन, आई," द्वारा की जायेगी। वही दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में संस्थागत निवेशक भी होते है,जो एक ही ट्रान्जेक्शन में लाखों शेयरो का लेन-देन करते है। इसलिए एक्सचेंज में शेयरो की खरीद व बिक्री में बहुत बड़ा अंतर आता है। यही कारण है कि शेयरो के भाव पल-पल में बदलते है।
संस्थागत निवेशको तथा व्यक्तिगत रूप से बड़ा निवेश करनेवाले ( एच, एन, आई, ) निवेशको द्वारा लाखो शेयरो की एक ही दिन में कई-कई बार खरीद व बिक्री शेयरो के भाव को कई-कई बार बहुत ऊपर तो कई-कई बार नीचे ले आती है।
अब "डिमैटिरिय लाइजेशन" के कारण शेयरो के कागजी लेन-देन की प्रथा खत्म ही गई है और इसी कारण अब कोई भी निवेशक कंपनी का यदि एक शेयर भी खरीदना चाहता है तो खरीद सकता है।
शेयरो की खरीद व बिक्री "लिवाली-बिकवाली" ट्रेडिंग कहलाती है। कैसे यह प्रक्रिया हर निवेशक के लिए एक जैसी दिखती है,लेकिन अलग-अलग श्रेणी के निवेशको के लिए यह खरीद-फरोख्त कई मायनों में अलग होती है। इसमें सबसे बड़ा फर्क है "मात्रा" का
एक छोटा निवेशक किसी विशेष कंपनी के 50 से 100 शेअर खरीदेगा लेकिन इन शेयरो की खरीद का आंकड़ा तब बहुत ज्यादा होगा,जब इस कंपनी के शेयरो की खरीद "एच्,एन, आई," द्वारा की जायेगी। वही दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में संस्थागत निवेशक भी होते है,जो एक ही ट्रान्जेक्शन में लाखों शेयरो का लेन-देन करते है। इसलिए एक्सचेंज में शेयरो की खरीद व बिक्री में बहुत बड़ा अंतर आता है। यही कारण है कि शेयरो के भाव पल-पल में बदलते है।
संस्थागत निवेशको तथा व्यक्तिगत रूप से बड़ा निवेश करनेवाले ( एच, एन, आई, ) निवेशको द्वारा लाखो शेयरो की एक ही दिन में कई-कई बार खरीद व बिक्री शेयरो के भाव को कई-कई बार बहुत ऊपर तो कई-कई बार नीचे ले आती है।
अब "डिमैटिरिय लाइजेशन" के कारण शेयरो के कागजी लेन-देन की प्रथा खत्म ही गई है और इसी कारण अब कोई भी निवेशक कंपनी का यदि एक शेयर भी खरीदना चाहता है तो खरीद सकता है।
शेयर खरीदने की प्रक्रिया://
वह निवेशक जो शेयर खरीदना चाहता है,उसे खरीद का ऑर्डर (बॉय आर्डर ) देना होगा। जब यह आर्डर मान्य ( एग्जीक्यूट ) हो जाता है,तब पे-आउट के बाद सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि निवेशक का शेयर उसके डी-मैट एकाउंट में आ गया है। वही दूसरी ओर डे-ट्रेडर होते है,जो अपनी पोजिशन उसी दिन स्क्वॉयर ऑफ करते है,इसलिए उन्हें शेयर न तो मिलते है और न ही वे देते है।उन्हें उस शेअर की खरीद व बिक्री से होनेवाले फायदे या नुकसान का अंतर प्राप्त होता है।
उदाहरण के लिए,यदि एक डे-ट्रेडर ने 100 शेयर रिलांयस पेट्रो के 10,000 रुपये में सुबह लिए और उसी दिन उन 100 शेयरो को 12,000 रुपये में बेंच दिया। ऐसी स्थिति में उस निवेशक को रिलायन्स पेट्रो के शेअर न तो प्राप्त होंगे और न ही वह देगा; लेकिन उसे खरीद व बिक्री के बीच जो अंतर है,वह फायदा मिलेगा। उपयुक्त स्थिति में निवेशक को 2,000 रुपये का लाभ हुआ;लेकिन उसमें से ब्रोकरेज कॉस्ट और दूसरे खर्च निकालकर बाकी बचा लाभ निवेशक के एकाउंट में आ जायगा।
उदाहरण के लिए,यदि एक डे-ट्रेडर ने 100 शेयर रिलांयस पेट्रो के 10,000 रुपये में सुबह लिए और उसी दिन उन 100 शेयरो को 12,000 रुपये में बेंच दिया। ऐसी स्थिति में उस निवेशक को रिलायन्स पेट्रो के शेअर न तो प्राप्त होंगे और न ही वह देगा; लेकिन उसे खरीद व बिक्री के बीच जो अंतर है,वह फायदा मिलेगा। उपयुक्त स्थिति में निवेशक को 2,000 रुपये का लाभ हुआ;लेकिन उसमें से ब्रोकरेज कॉस्ट और दूसरे खर्च निकालकर बाकी बचा लाभ निवेशक के एकाउंट में आ जायगा।
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