शेयर के प्रकार के बारे में इन्फॉर्मेशन तथा टिप्स

शेयर की टिप्स और प्रकार के बारे में इंफॉमशन दिया गया है
        शेयरो की श्रेणी प्रकार
IP
हेलो दोस्तो मैं प्रेमगेन्द्रे अपने इस ब्लॉग में शेयर के प्रकार के बारे में बताया हु जिसे आप फॉलो करके अपना निवेश को डेबलोप करसकते हो

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध शेयरो को विभिन्न श्रेणियों में बाटा गया है,जैसे ए, बी 1,बी 2 आदि। शेयरो को इन श्रेणियों में विभाजित करने के अपने मतलब तथा अपनी व्याख्याए है। किसी शेअर को किसी श्रेणी में रखने से पहले कई बातों पर विचार किया जाता है।इनमे से 2 प्रमुख बिंदु है,जिन पर प्रमुख रूप से गौर किया जाता है। पहला है "मार्केट कैपिटलाइजेशन" तथा दूसरा है--"ट्रेडिंग वेल्युम" इनदोनो प्रमुख बातो को मिलाकर तय किया जाता है कि कई किस श्रेणी के अंतर्गत माना जायेगा। "ए" ग्रुप की कंपनियों का "उच्च बाजार पूंजीकरण" तथा "उच्च ट्रेडिंग वेल्युम" होता है। यधपि उच्च बाजार पूंजीकरण तथा "मध्यम बाजार पूंजीकरण" के वर्गीकरण के मापदण्डो में परिवर्तन होता रहता है। जिन कंपनीयो का मार्केट कैपिटलाइजेशन माध्यम आकर का होता है तथा शेयरो की तरलता अपेक्षाकृत कम होती है,उन्हें "बी1" श्रेणी में आंका जाता है। शेयरो की कीमतों में परिवर्तन तथा बाजार की परिस्थितियों में बदलाव के चलते कंपनीयो के शेयर एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी में परिवर्तित हो सकते है।

"एस" ग्रुप://
छोटी कंपनीया,जिनका पैडअप कैपिटल 20 करोड़ रुपये तक का हो तथा वे बी,एस, ई ( बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ) में सूचीबध्द हो "एस" ग्रुप के शेयर्स कहलाते है। यहाँ एस का मतलब है--स्मॉल कैपिटल स्टॉक इनमे से कई कंपनियां पहले क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होती थी,फिर उन्हें इस श्रेणी में डाला गया।

"टी" ग्रुप://

इस "टी" ग्रुप श्रेणी के अंतर्गत वे कंपनीया आती है, जिनकी शेयरो की ट्रेडिंग में बहुत ज्यादा स्पेक्युलेशन तथा वोलेटिलिटी रहती है।स्पेक्युलेशन के प्रभाव को कम करने के लिए शेयरो को इस श्रेणी में डाला जाता है। इस श्रेणी के तरह दर्ज शेयरो की ट्रेडिंग के दौरान प्रत्येक लेन-देन में शेयरो की डिलीवरी देना अनिवार्य होता है,ताकि जब तक कोई निवेशक शेयरो की डिलीवरी देने में सक्षम न हो,शेयरो का लेन-देन न कर सके।इससे स्पेक्युलेशन पर नियंत्रण रहता है।

"जेड" श्रेणी ://
निवेशको को "जेड" श्रेणी के शेयरो के प्रति सदैव सावधान रहना चाहिए;क्योकि इस श्रेणी की कंपनियों द्वारा स्टॉक एक्सचेंज के मापदंडों का पूरी तरह पालन नही किया गया होता है। इस श्रेणी के शेयरो में  निवेश जोखिम भरा हो सकता है; क्योकि इन कंपनीयो के साथ डिलिस्टिंग कि  सम्भावना जुड़ी होती है। ऐसी स्थिति में निवेशक कभी मालामाल तो कभी कंगाल हो सकता है।


सेटलमेंट सायकिल;//
निवेशक के लिए सेटलमेंट की प्रक्रिया समझना बहुत जरूरी है। निवेशक द्वारा शेयर की खरीद या बिक्री संबन्धी निर्णय लिये जाने के बाद "सेटलमेंट सायकिल" शुरू होता है। यह सायकिल "पे-इन या"पे-आउट"द्वारा सम्पूर्ण होता है,जो वास्तविक ट्रान्जेक्शन के 2 कार्य दिवसों के पश्चात सपूर्ण होता है। शेयरो की खरीद का मूल्य अदा किया जाता है तथा खरीददार के खाते में शेअर स्थानांतरित हो जाते है।"पे-आउट"स्थिति में खरीदार को सिक्युरिटीज की डिलीवरी दे दी जाता है और बिक्रीकर्ता के खाते में शेयरो का बिक्री मूल्य जमा हो जाता है।
             "पे-आउट"की स्थितिमे खरीदार को शेयर प्राप्त होते है तथा बिक्रीकर्ता को उसके द्वारा बेचे गए शेयरो का मूल्य। दोनों ट्रांजेक्शन खरीदार तथा बिक्रीकर्ता के डी-मैट एकाउंट में दर्ज होते है। इस प्रकार शेयरो की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया पूरी होती हैं। यदि खरीदार पे-आउट के दिन रक शेयर का मूल्य धन के रूप में प्रस्तुत नही कर पाता है तो वे शेयर ऑक्शन (नीलामी) के लिए प्रस्तुत किए जाते है और ऑक्शन में जो शेयरो की कीमत तय की जाती है,वह उसे चुकाने के लिए बाध्य होता है।
      उदाहरण के लिए, यदि निवेशक द्वारा सोमवार को शेअर खरीद गए हैं तो उस अमाउंट का पे-इन और बुधवार को संपन्न होगा। इसी के अनुसार निवेशक को यह सुनिश्चित करना होता है कि पैसों का भुगतान  तुरन्त किया गया है,और तब उसके बाद निवेशक को उसके डी-मैट अकॉउंट में शेयर प्राप्त होंगे। पे-इन की स्थिति में बिक्रीकर्ता द्वारा बेचे गए शेयर तथा खरीदार द्वारा शेयरो का खरीदा गया मूल्य एक्सचेंज में प्रस्तुत किया जाता है।

सिस्टम://

एक्सचेंज के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में बिक्रीकर्ता व खरीदार द्वारा दिए गए आर्डर का मिलान होता है। यही कारण है कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता होती है बाजार की स्थिति कैसी है तथा माँग व पूर्ति के गणित इस बात पर निर्भर करता है कि खरीदार किस कीमत पर शेयर खरीदना चाहते है और बिक्रीकर्ता किस कीमत पर शेयर की कितनी
     मात्रा बेचने को तैयार है।"सेटलमेंट सायकिल" वह समय है, जिसके दौरान नेट पोजिशन की गणना की जाती है और पैसों की प्राप्ति या भुगतान तथा शेयरो की डिलीवरी सुनिचित की जाती है। पहले यह प्रक्रिया पूरी होने में पूरा एक सप्ताह लगता था,वहाँ अब सिर्फ एक दिन में यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है।इसी सुविधा के चलते यदि निवेशक शेयरो की खरीद या बिक्री करने के बाद यह निर्णय लेता है कि उसे उन शेयरो की उसी दिन दुबारा खरीद या बिक्री करनी है तो वह अपनी पोजिशन ओपन रखकर उस दिन ही सौदा "स्क्वॉयर ऑफ" कर सकता है। उदाहरण के लिए,अपने मार्केट में कैश सेगमेंट में रिलायंस इंडस्ट्रीज के 100 शेयर 2,000 रुपये प्रति शेयर के भावसे सुबह खरीदे,लेकिन 2 घण्टे बाद आपको लगता है कि प्रति शेअर भाव 500 रुपये बढ़ गया है, तो आप उस शेयर को उस दिन बाजार बंद होने से पहले बेचने का आर्डर भी दे सकते है। ऐसी स्थिति में आपको डी-मैट अकॉउंट में रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेअर नही आएगा,बल्कि आपके अकॉउंट में खरीद व बिक्री के बीच हुऐ लाभ का अंतर दर्ज हो जायेगा।


SHARE

Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

Post a Comment

Investing tips for share market

Hello freinds I am prem bendre my blog is share market basic tips know lagde share purchase tips for companies 30 days इन्वेस्टर महान...