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"हैड", "बॉडी" और "टेल"

 बाजार में हर रैली का एक "हैड', बॉडी' और 'टेल' होते है। ये शब्द नेताओ,अनुयायियों और सुस्त व्यक्तियों से लिए गए है।
    किसी भी स्कूल कक्षा में 'आगे बैठने वाले' या 'अच्छे नम्बर पाने वाले विद्यार्थी होते है। उसके बाद मध्यम योग्यता रखने वाले बहुमत विद्यार्थी और कक्षा में थोड़े से ही बहुत कमजोर विद्यार्थी होते है। एक कंपनी में भी शीर्ष प्रबंधन में थोड़े से कर्मचारी, मध्यम प्रबंधन में ज्यादा संख्या में और फिर नीचे के स्तर के कर्मचारी होते है।

    जब आप ट्रेडिंग करते है तो सबसे सुरक्षित यह रहता है कि आप 'हैड' को छोड़ दे। 'हैड' वह स्थिति है जहां शेयर ऊपर चढ़ रहे होते है लेकिन कारण किसी को नही पता होता। अधिकांश खुदरा निवेशक या कारोबारी के पास शेयर नही होते और उनकी अधिक चर्चा भी नही होती। यह वह चरण है जहां रैली में एक नकली शुरुआत हो सकती है लेकिन इसके बारे में या तो इसे संचालित करने वाले,या कंपनी के आंतरिक सूत्र या कुछेक वे लोग ही जानते है कि इस चरण में हो क्या रहा है। मात्रा में अभी भी बहुत अधिक उठान नही होती और जब शेयर बढ़ रहा हो तो यह स्पष्ट नही होता कि यह बढ़ोतरी,ऊपर उठता हुआ चरण है। इस 'हैड'चरण में शांत होकर बैठे रहे।
          इस चरण में जहां आपको रैली में कॉफी पहले प्रवेश करने की आवश्यकता होती है, 'बॉडी'कहलाता है। इस चरण में शेयरों की मात्रा बढ़ने लगती है ओर उनकी वृद्धि की गति में तेजी आनी आरंभ हो जाती है। अगर आप प्रारंभिक चरण से वंचित हो गए है तो थोड़ी देर से प्रवेश कर सकते है क्योंकि लम्बी अवधि के लिए संचित 'बॉडी'अधिक देर तक रहती है।
          और आखिरी चरण है --'टेल'। इस चरण में मात्रा ऊंची बनी रहती है लेकिन उसकी वृद्धि की गति या कीमत में वृद्धि थम जाती है। कीमते अब और नही बढ़ती या फिर वे गिरनी आरम्भ हो जाती है। शेयर में खुदरा कारोबारियों और निवेशको की भरमार हो जाती है। जैसे ही शेयर 'टेल' में प्रवेश करता है,उससे तुरन्त बाहर निकल जाए। टेल' में जाने पर यह अनुमान नही हो पाता कि शेयरों में गिरावट कब तक जारी रहेगी। आमतौर पर,एक बार 'टेल' में पहुंचने पर 'वितरण' का चरण प्रारम्भ हो जाती है।
       एक शेयर ऐसा भी है, जिनकी 'बॉडी'बहुत लंबी होती है। यह आपको कई चरणों मे,इसमें प्रवेश करने का पर्याप्त समय देता है। ऐसी गतिविधियां कम मात्रा वाले शेयर में होती है या कम 'अस्थायी'शेयरों में कोई भी खरीद,इनकी कीमतों को ऊपर उठाती है और कई महीनों तक यह वृद्धि बनी रहती है --भले ही मात्रा महत्वपूर्ण या अधिक नही है।
           आप कैसे जान सकते है कि बाजार कब 'हैड', 'बॉडी' या 'टेल' में है? बाजार के 5 चरण होते है और दूसरे और पांचवे चरण में बाजार, लम्बी रैली की 'बॉडी' में होते है।
         
 पहला चरण--बुनियादी चरण--"दुनिया खत्म होने जा रही है" चरण। शायद "बुनियादी बांतो"पर शेयर खरीद का सबसे अच्छा समय या मैं कहूंगा-- "गलत कीमत"।

दूसरा चरण----"चरित्रहीन"चरण--"मैं एक सीमा में फंस गया हूँ।---आपूर्ति और मांग एक सी है। ऊंची कीमत पर पर्याप्त विक्रेता। कम कीमत पर पर्याप्त खरीदार।
 
 तीसरा चरण--मुझे "मूल्यांकन" चरण में विश्वास नही।--"आपूर्ति गला घोंट चरण। शेयर,संस्थागत निवेशको के हाथों में चले जाते है या कम "अस्थायी"शेयर दिए जाने पर, कोई भी खरीद शेयर को ऊपर उठा देती है। किसी बड़े आर्डर की प्राप्ति का अर्थ है,शेयर में बहुत तेजी आना क्योकि वहां आपूर्ति न के बराबर है। कारण कोई भी हो, कई शेयर प्रतिदिन बहुत तेजी से ऊपर चढ़ते है यह स्पष्ट संकेत है कि आपूर्ति की कोई भी चाल, विक्रेताओं की उपलब्धता को एक झटके में, कठिन बना देती है।

चौथा चरण--"विस्फोट" चरण--हम अभी वहां तक नही पहुंचे। लेकिन यह चरण देखने योग्य है।
 
पांचवा चरण--"बुझा हुआ"चरण--खुदरा व्यापार हर ओर छाया हुआ है। बहुत ज्यादा कागजी कार्रवाई। बहुत अधिक आपूर्ति। और निर्णय इस शुद्ध धारणा पर आधारित है कि कीमतों का ऊपर उठना जारी रहेगा। संस्थागत निवेशक "समूहों" में बिकवाली कर रहे है। खुदरा निवेशको की दिलचस्पी से ,'समूहों'को भी खपा लिया जाता है। तब तक ,जब तक कि संस्थाए,आई,पी,ओ,और प्रमोटरों की ओर से आपूर्ति बहुत अधिक है, जो महसूस करते है कि शेयरों की कीमतें हास्यास्पद हद तक पहुच चुकी है। जो इस चरण में शेयर खरीदते है, उनके लिए बाहर निकलने का कोई रास्ता नही है, जब तक कि शेयरों की कीमतों में बहुत बड़ी गिरावट न आ जाए।
          "लंगर प्रभाव" शेयर की कीमत निर्धारित करता है
             जब हम किसी एक कीमत के आदि हो जाते है, "सस्ता होना" उस कीमत के लिए एक "छूट"बन जाता है। यानी एक शेयर 3-4,वर्षो से 500 रुपये पर बना हुआ है और अचानक ही वह 300 रुपये तक गिर जाता है तो यह "सस्ता" दिखता है। हम में से अधिकांश लोग इस "सस्ते"स्तर पर खरीद करते है यदि यही शेयर उन्ही बुनियादी बातों के साथ,50 रुपये से100 रुपये तक आ जाता है तो हम उसे "महंगा" मानते है या "अधि-मूल्यांकित"करार देते है। हम "सस्ते" और "महंगे" होने की व्याख्या,शेयर की उस कीमत से तय करते है , जिसके हम आदि हो चुके है।
      ऐसा ही होता है और यह निवेश में सबसे खतरनाक कमी बनी हुई है। इसे "लंगर-प्रभाव"कहा जाता है। वह कीमत, जिसके हम आदि हो चुके होते है, "लंगर"कीमत कहलाती है। और हम उस "लंगर कीमत',से नीचे गिरने को "छूट' मानते है और ऊपर उठने को "महंगी' कीमत।
              कुछ समय पूर्व की कीमत और वर्तमान कीमत में तुलना के आधार पर शेयर कभी न खरीदे। इम शेयर जो सस्ता दिखता है,और भी सस्ता हो सकता है और महंगा दिखने वाला शेयर मौजूदा स्तर से दुगुनी या तिगुनी हो सकता है।
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Milan Tomic

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