इंवेशटिंग और सिक्योरिटीज ऑफ शेअर्स
सिक्योरिटीज मार्केट का परिचय
नमस्कार दोस्तो मैं प्रेमगेन्द्रे अपने इंवेशटिंग की जानकारी को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हु जिससे आप अपने इंवेशटिंग की दुनिया के परेसानी को दूर कर सकते है और इसमें सिक्योरिटीज के बारे में भी
बताया हु धन्यवाद दोस्त आपका इंवेशटिंग में लाभ ही लाभ हो
( Introduction to Securities market )
सिक्योरिटीज। ( securities ):
सिक्योरिटीज कॉन्ट्रक्ट रेगुलेशन एक्ट 1956 में "सिक्युरिटीज' को परिभाषित किया गया है। इस मे शेयर्स,बांड, स्क्रिप्ट अथवा उसी तरह की किसी भी कंपनी अथवा कॉर्पोरेट संस्था या सरकार द्वारा इश्यू किए और बाजार में बेचे जा सके ऐसे अन्य सिक्योरिटीज का समावेश किया जाता है। सिक्योरिटीज के डेरिवेटिव्ह इंस्टुमेंट, बचत योजनाओं ने एकत्रित किए यूनिट, सिक्योरिटीज में किए निवेश पर मिलने वाला ब्याज,राइट सिक्योरिटीज और साथ ही साथ केंद्र सरकार द्वारा सिक्योरिटीज के नाम से घोषित किए रिसिप्ट अथवा उन जैसे ही अन्य इंस्टुमेंट का इसमे समावेष किया गया है।
सिक्योरिटीज के प्रकार
(Types of Securities ):
सिक्योरिटी मार्किट के निवेशक शेयर्स,डेब्ट इंस्टुमेंट, डेरिवेटिव्हज प्रोडक्ट और म्यूच्यूअल फण्ड के यूनिट वगैरह में निवेश कर सकते है।
सिक्योरिटी मार्केट (Securities Market ):
सिक्योरिटीज मार्केट एक ऐसी जगह है, जहाँ पर खरीददार और विक्रेता शेयर्स, बॉन्ड और डिबेंचर वगैरह की खरीदी और बिक्री का सौदा कर सकते है। साथ ही मार्केट कॉरपोरेट, व्यापार उद्द्योग क्षेत्र के साहसी लोगो को उनकी कंपनी और व्यापार के लिए पैसा जुटाने का जरिया दिलाने की महत्व की भूमिका निभाते है। इस बाजार के माध्यम से जिन लोगो के पास निष्क्रिय धन उपलब्ध है उन निवेशको के पास से वह निष्क्रिय धन जिन्हें जरूरत है उन कॉरपोरेट जगत के लोगो के पास ट्रांसफर किए जा सकता है। सिक्योरिटी मार्केट के माध्यम से यह कार्य बहुत आसानी से किया जा सकता है। सोक्योरिटी मार्केट निवेशको को बचत के रुपयों से कितना हिस्सा बचत के लिए और कितना हिस्सा व्यापार के लिए इस्तेमाल करना चाहिए इसके लिए मार्गदर्शित करती है। बचत को निवेश से जोड़ने वाली अलग अलग मध्यस्थि संस्था द्वारा इश्यू किए गए असंख्य आर्थिक प्रोडक्ट्स को सिक्योरिटी के नाम से जाना जाता है।
सिक्योरिटी मार्केट के विभाग
( Segments of Securities market ):
सिक्योरिटी मार्केट के दो स्वतंत्र विभाग है। उनमें नए इश्यू का मार्ग उपलब्ध करके देनेवाले प्रायमरी मार्केट का और शेयर्स बाजार में पहले से ही लिस्ट हुए शेयर्स अथवा अन्य इंस्टुमेंट का दुबारा लेनदेन करने का मार्ग उपलब्ध करके देनेवाले सेकंडरी मार्केट का समावेश होता है। प्रायमरी मार्केट कंपनी द्वारा इश्यू होने वाले नए सिक्योरिटीज की बिक्री के लिए मार्ग उपलब्ध करता है। जहाँ सेकंडरी मार्केट कंपनी द्वारा पहले इश्यू किए गए सिक्योरिटीज पर व्यवहार करने के लिए मार्ग उपलब्ध करते है।
प्रायमरी मार्केट ( Primary Market ):
प्राइमरी मार्केट एक ऐसा स्थान है, जहाँ पर इनिशियल पब्लिक ऑफर (ipo) के माध्यम से नई सेक्युरिटिस की बिक्री की जाती है। दूसरे शब्दों में कहना होतो प्राइमरी मार्केट नए सिक्योरिटीज की बिक्री के लिए मार्ग उपलब्ध कराता है। राज्य और केंद्र सरकार की कंपनीयो ओर कुछ प्रायव्हेट कंपनीयो के जरिए नई सिक्योरिटी इश्यू की जाती है।
कॉरपोरेट कंपनीया मूल कीमत पर अथवा उन पर प्रीमियम याने अधिक रकम लागू करके अथवा डिस्काउंट देकर सिक्योरिटीस इश्यू करते है। वह शेयर्स अथवा डेब्ट के स्वरूप में इस सिक्योरिटीज को इश्यू करते है। यह कंपनीया स्थानिक बाजार में अथवा आन्तराष्टीय बाजार में सिक्योरिटी इश्यू कर सकते है।
सेकंडरी मार्केट ( Secondery market ):
सेकंडरी मार्केट यह एक ऐसा स्थान है। जहां पर प्रियमरी मार्केट में इनिशियल पब्लिक ऑफर के जरिये बेची गई सिक्योरिटीज का दुबारा खरीदी बिक्री अथवा ट्रेडिंग करने का कार्य किया जाता है।स्टॉक एक्सचेंज के ज़रिए शेयर्स बाजार में लिस्ट हुई कंपनीयो के सिक्योरिटीज का भी सेकंडरी मार्केट में ही व्यवहार किया जाता है। सिक्योरिटी का बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग सेकंडरी मार्केट में किया जाता है। सेकंडरी मार्केट में इक्विटी मार्केट और डेब्ट मार्केट का समावेश होता है।
डेरिवेटिव्हज मार्केट ( Derivaties Market ):
सेकंडरी मार्केट से फॉरवर्ड मार्केट जरा अलग है। इस बाजार को डेरिवेटिव्हज मार्केट कहके भी जाना जाता है। इस बाजार में सिक्योरिटीज का ट्रेडिंग किया जाता है परंतु उनकी डिलीवरी अथवा पेमेंट भविष्य में देना पड़ती है।
डेरिवेटिव्हस के बाजार में फिलहाल फॉरवर्ड के जो व्यवहार किए जाते है वह फ्यूचर्स और ऑप्शन के व्यवहार है। फ्यूचर्स के मार्केट में स्टंडर्ड सिक्योरिटीज का ही ट्रेडिंग किया जाता है। यह ट्रेडिंग करनेवालो को भविष्य में डिलीवरी अथवा सेटलमेंट व्यवहार चुकता करना पड़ता है। फ्यूचर्स के व्यवहार किसी भी व्यक्तिगत सिक्योरिटी पर अथवा किसी भी इंडेक्स पर हो सकते है। ऑप्शन के विषय मे बताना हो तो भविष्य में डिलीवरी लेने की शर्तों सहित सिक्योरिटीज का भी ट्रेडिंग किया जाता है।
शेयर्स बाजार ( Stock Exchange ):
शेयर्स का बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग शेयर बाजार में किया जाता है। शेयर बाजार एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहाँ शेअर्स की खरीदी का और बिक्री का भाव निश्चित करके व्यवहार किया जाता है। पहले शेयर बाजार एक स्थान हुआ करता था। शेयर बाजार के ट्रेडिंग फ्लोर पर लेन देन किया जाता था। आपने कभी चित्रों में ट्रेडिंग फ्लोर देखा होगा। इस ट्रेडिंग फ्लोर पर लोगो को हाथ ऊंचे करके जोर जोर से चिल्लाकर साथ ही एक दूसरे को संकेत करके व्यवहार करते हुए देखा होगा। शेयर बाजार में व्यवहार करने का यह एक पुराना तरीका था।
यह प्रथा अब अस्तित्व में नही है। फिलहाल वच्युरल ट्रेडिंग फ्लोर में
कंप्यूटर के नेटवर्क का समावेश होता है। इस नेटवर्क के जरिए दुनियाभर के देशों में ट्रेडिंग के लिए इसी सिस्टम का उपयोग किया जाता है।
शेअर बाजार का मूलभूत हेतु खरीददार और विक्रेता के सिक्योरिटीस का व्यवहार पूर्ण होने के लिए जरूरी सुविधा उपलब्ध कराना और जोखिम को कम करना है। शेअर बाजार में प्रायमरी और सेकंडरी ऐसे दो बाजार होते है। प्रायमरी मार्केट में नई सिक्योरिटीज इश्यू की जाती है और फिर उनका एक अस्तित्व निर्माण होने के बाद उन सिक्योरिटीज का व्यवहार सेकंडरी मार्केट में होता है। शेअर बाजार के माध्यम से यह व्यवहार पूरा होता है।
भारतीय स्टॉक एक्सचेंज
( Stock Exchanges In India ):
भारत मे कुल 24 स्टॉक एक्सचेंज है। इन सभी को भारत सरकार ने मान्यता दी है। उनमे से सबसे बड़े और महत्व के बाजार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( nse ) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ( bse )का समावेश होता है। भारत के शेअर बाजार में हर दिन होनेवाले ट्रेडिंग में बड़े पैमाने की ट्रेडिंग nse और bse के जरिये ही होती है
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज- एन, एस, ई
(National Stock Exchange- N, S, E ):
1994 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज शुरू किया गया। यह एक्सचेंज शुरू करने के पीछे का हेतु आगे दिया है।
(1)*.... राष्टीय स्तर पर इक्विटी डेब्ट और इन जैसे अन्य इंस्टुमेंट का व्यवहार कर पाना ।
(2)*... देश भर के निवेशकों को साथ मे व्यवहार करने का मौका प्राप्त करना।
(3)*.... सोक्योरिटीस के व्यवहार में आसानी लाने के लिए। व्यवहार कार्यक्षम होना चाहिए इसीलिए और उनमें पारदर्शकता आए इसलिए।
(4)*... व्यवहार के सेटलमेंट साइकिल अर्थात कालावधि कम करने के लिए।
(5)*.... सिक्योरिटीस के मार्केट के उद्देशों को अंतर्राष्टीय स्तर पर लाने के लिए। यह एक्सचेंज बिना ट्रेडिंग रिंग वाले राष्टीय स्तर के कप्यूटराइज शेअर बाजार के ही स्वरूप में रहे इसीलिए।
यह एक्सचेंज 2 हिस्सो में विभाजित किया है। एक कैपिटल मार्केट और दूसरा होलसेल डेब्ट मार्केट।
कैपिटल मार्केट के हिस्सों में इक्विटी शेअर्स, कन्वर्टिबल डिबेंचर्स और नॉन कन्वर्टिबल डिबेंचर्स का समावेष होता है। होलसेल डेब्ट मार्केट में सरकारी डेब्ट , जाहिर क्षेत्र की कंपनीयो के बॉन्ड, कमर्शियल पेपर और डेब्ट के अन्य इंस्टुमेंट के उच्च कीमत के व्यवहारों का कामकाज होता है। कैपिटल मार्केट से सबंधित ट्रेडिंग मेंबर्स मुम्बई में स्थापित किए गए मध्यस्थ कंप्यूटर के द्वारा जुड़े होते है। इसके लिए वेरी स्मॉल अपर्चर टर्मिनल्स याने की वी-सेट का उपयोग किया जाता है। उसी तरह होलसेल डेब्ट मार्केट से सम्बंधित ट्रेडिंग मेंबर भी मुम्बई में स्थापित हुए मध्यस्थ कंप्यूटर के जरिए हाईस्पीड लाइंस के द्वारा एक दूसरे से सबन्ध जोड़ते है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज आर्डर पर आधारित सिस्टम का उपयोग करता है उनके सिस्टम में ट्रेडिंग मेंबर द्वारा आर्डर दिया जाता है। तब अपने आप आर्डर कन्फर्मेशन स्लिप अर्थात आर्डर दिया जाता है यह निर्देशित करने वाली रसीद तैयार की जाती है। उसमें दी हुई सिक्योरिटीस की संख्या,कौनसी कीमत पर निवेशक सिक्योरिटीज बेचना चाहते है और सामने से किसी भी पक्ष ने उनकी खरीद की हो तो उस पक्ष का कोड नम्बर भी इस स्लिप में दर्ज किया जाती है। इस तरह का यह सिस्टीम है।
एन, एस, ई में स्क्रिप्ट को उसके प्रतीक (चिन्ह) से पहचाना जाता है। उदा, इंफोसिस टेक् का प्रतीक (चिन्ह) Infosystch है। एन, एस, ई का इंडेक्स निफ़्टी है।
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज-बी,एस, ई
( Bombay stock Exchange- B S E ):
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज एशिया का सबसे पुराना शेअर बाजार है। यह बी,एस, ई, के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। 1875 में द नेटिव शेअर अंड स्टॉक ब्रोकर असोसिएशन के नामसे इसकी स्थापना हुई थी भारत सरकार से मान्यता हासिल करनेवाला यह देश का पहला एक्सचेंज है। भारत सरकार ने इसे 1956 में सिक्योरिटीस कॉन्ट्रक्ट रेग्युलेशन एक्ट 1956 के अंतर्गत स्थायी स्वरूप की मान्यता दी थी।यह एक्सचेंज भारतीय कैपिटल मार्केट को विकसित करने में मुख्य और महत्व की भूमिका निभाता है बी,एस, ई, का इंडेक्स सेंसेक्स है और इस इंडेक्स पर विश्वभर की नजर होती है।
डेरिवेटिव्हस इक्विटी और डेब्ट इंस्टुमेंट में ट्रेडिंग करने के लिए यह एक्सचेंज कार्यक्षम और पारदर्शक बाजार तैयार करता है।
बी,एस, ई में स्क्रिप्ट को उनके कोड नम्बर से पहचाना जाता है। उदा, इंफोसिस टेक् का बी,एस, ई कोड नम्बर 500209 है।
ट्रेडिंग करने का तरीका (Treding Styles):
इस बाजार में मुख्य रूप से 3 प्रकार से ट्रेडिंग होती है। एक डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग, दूसरी डे ट्रेडिंग और तीसरी डेरिवेटिव्हज ट्रेडिंग।
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग
( Delivery Based Trede ):
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग में व्यवहार करने के बाद सामान्यरूप से जिनते दिनों में सेटलमेंट करने की व्यवहस्था बाजार के मंजिमेन्ट द्वारा निश्चित की गई है। उस तरह से शेअर्स की डिलीवरी और उसका पेमेंट किया जाता है। डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग में पहले शेअर्स की खरीदी की जाती है और बाद में भाव बढ़ने पर शेअर्स को बेचा जाता है।
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग की मर्यादा
( Limitations of Delivery Based Treding ):
*.... मंदी के माहोल में डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग नही की जा सकती।
*.... शार्ट सेलिंग नही कर सकते।
डे ट्रेडिंग। ( Day Treding ):
डे ट्रेडिंग याने दिन के दरम्यान व्यवहार करके पोजिशन खड़ी करना और दिन के अंत मे खड़ी की हुई पोजिशन बन्द करना। डे ट्रेडर को दिन के दरम्यान किए हुए ट्रेडिंग को बाजार बंद होने से पूर्व ही पूरा करना पड़ता है। डे ट्रेडर दिन के दरम्यान, शेअर्स की कीमत में होनेवाले उतार-चढ़ाव में से मुनाफा कमाने का प्रयत्न करता है परंतु दिन के अंत मे उसे अपनी सभी पोजिशन निकालनी पड़ती है अर्थात बन्द करनी पड़ती है।
डेरिवेटिव्हज ट्रेडिंग
( Derivatives Treding ):
डेरिवेटिव्हज एक ऐसा प्रोडक्ट है जिनकी कीमत एक या अनेक कीमतों के विचार करके निश्चित की जाती है जिसे हम बेस (अंडरलाइन असेट) कहके जानते है। डेरिवेटिव्हज का ट्रेडिंग कॉन्ट्रक्ट की तरह से ही होता है। अंडरलाइन असेट यह इक्विटी,फॉरेक्स,कमोडिटी या अन्य कोई भी असेट हो सकते है। डेरिवेटिव्हज कॉन्ट्रक्ट में कई व्हेरिअन्त होते है। दूसरे शब्दों में बताना हो तो उसमें ट्रेडिंग करने के लिए अलग अलग मीडियम है। इन मीडियम में से प्रचलित मीडियम में फ्यूचर्स कॉन्ट्रक्ट और ऑप्शन कॉन्ट्रक्ट का समावेष होता है। इनमे ट्रेडिंग करनेवाले मुख्य रूप से स्पेक्युलेटर्स, हेजर्स और आर्बिटेजर्स होते है।
सिक्योरिटीज मार्केट का परिचय
नमस्कार दोस्तो मैं प्रेमगेन्द्रे अपने इंवेशटिंग की जानकारी को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हु जिससे आप अपने इंवेशटिंग की दुनिया के परेसानी को दूर कर सकते है और इसमें सिक्योरिटीज के बारे में भी
बताया हु धन्यवाद दोस्त आपका इंवेशटिंग में लाभ ही लाभ हो
( Introduction to Securities market )
सिक्योरिटीज। ( securities ):
सिक्योरिटीज कॉन्ट्रक्ट रेगुलेशन एक्ट 1956 में "सिक्युरिटीज' को परिभाषित किया गया है। इस मे शेयर्स,बांड, स्क्रिप्ट अथवा उसी तरह की किसी भी कंपनी अथवा कॉर्पोरेट संस्था या सरकार द्वारा इश्यू किए और बाजार में बेचे जा सके ऐसे अन्य सिक्योरिटीज का समावेश किया जाता है। सिक्योरिटीज के डेरिवेटिव्ह इंस्टुमेंट, बचत योजनाओं ने एकत्रित किए यूनिट, सिक्योरिटीज में किए निवेश पर मिलने वाला ब्याज,राइट सिक्योरिटीज और साथ ही साथ केंद्र सरकार द्वारा सिक्योरिटीज के नाम से घोषित किए रिसिप्ट अथवा उन जैसे ही अन्य इंस्टुमेंट का इसमे समावेष किया गया है।
सिक्योरिटीज के प्रकार
(Types of Securities ):
सिक्योरिटी मार्किट के निवेशक शेयर्स,डेब्ट इंस्टुमेंट, डेरिवेटिव्हज प्रोडक्ट और म्यूच्यूअल फण्ड के यूनिट वगैरह में निवेश कर सकते है।
सिक्योरिटी मार्केट (Securities Market ):
सिक्योरिटीज मार्केट एक ऐसी जगह है, जहाँ पर खरीददार और विक्रेता शेयर्स, बॉन्ड और डिबेंचर वगैरह की खरीदी और बिक्री का सौदा कर सकते है। साथ ही मार्केट कॉरपोरेट, व्यापार उद्द्योग क्षेत्र के साहसी लोगो को उनकी कंपनी और व्यापार के लिए पैसा जुटाने का जरिया दिलाने की महत्व की भूमिका निभाते है। इस बाजार के माध्यम से जिन लोगो के पास निष्क्रिय धन उपलब्ध है उन निवेशको के पास से वह निष्क्रिय धन जिन्हें जरूरत है उन कॉरपोरेट जगत के लोगो के पास ट्रांसफर किए जा सकता है। सिक्योरिटी मार्केट के माध्यम से यह कार्य बहुत आसानी से किया जा सकता है। सोक्योरिटी मार्केट निवेशको को बचत के रुपयों से कितना हिस्सा बचत के लिए और कितना हिस्सा व्यापार के लिए इस्तेमाल करना चाहिए इसके लिए मार्गदर्शित करती है। बचत को निवेश से जोड़ने वाली अलग अलग मध्यस्थि संस्था द्वारा इश्यू किए गए असंख्य आर्थिक प्रोडक्ट्स को सिक्योरिटी के नाम से जाना जाता है।
सिक्योरिटी मार्केट के विभाग
( Segments of Securities market ):
सिक्योरिटी मार्केट के दो स्वतंत्र विभाग है। उनमें नए इश्यू का मार्ग उपलब्ध करके देनेवाले प्रायमरी मार्केट का और शेयर्स बाजार में पहले से ही लिस्ट हुए शेयर्स अथवा अन्य इंस्टुमेंट का दुबारा लेनदेन करने का मार्ग उपलब्ध करके देनेवाले सेकंडरी मार्केट का समावेश होता है। प्रायमरी मार्केट कंपनी द्वारा इश्यू होने वाले नए सिक्योरिटीज की बिक्री के लिए मार्ग उपलब्ध करता है। जहाँ सेकंडरी मार्केट कंपनी द्वारा पहले इश्यू किए गए सिक्योरिटीज पर व्यवहार करने के लिए मार्ग उपलब्ध करते है।
प्रायमरी मार्केट ( Primary Market ):
प्राइमरी मार्केट एक ऐसा स्थान है, जहाँ पर इनिशियल पब्लिक ऑफर (ipo) के माध्यम से नई सेक्युरिटिस की बिक्री की जाती है। दूसरे शब्दों में कहना होतो प्राइमरी मार्केट नए सिक्योरिटीज की बिक्री के लिए मार्ग उपलब्ध कराता है। राज्य और केंद्र सरकार की कंपनीयो ओर कुछ प्रायव्हेट कंपनीयो के जरिए नई सिक्योरिटी इश्यू की जाती है।
कॉरपोरेट कंपनीया मूल कीमत पर अथवा उन पर प्रीमियम याने अधिक रकम लागू करके अथवा डिस्काउंट देकर सिक्योरिटीस इश्यू करते है। वह शेयर्स अथवा डेब्ट के स्वरूप में इस सिक्योरिटीज को इश्यू करते है। यह कंपनीया स्थानिक बाजार में अथवा आन्तराष्टीय बाजार में सिक्योरिटी इश्यू कर सकते है।
सेकंडरी मार्केट ( Secondery market ):
सेकंडरी मार्केट यह एक ऐसा स्थान है। जहां पर प्रियमरी मार्केट में इनिशियल पब्लिक ऑफर के जरिये बेची गई सिक्योरिटीज का दुबारा खरीदी बिक्री अथवा ट्रेडिंग करने का कार्य किया जाता है।स्टॉक एक्सचेंज के ज़रिए शेयर्स बाजार में लिस्ट हुई कंपनीयो के सिक्योरिटीज का भी सेकंडरी मार्केट में ही व्यवहार किया जाता है। सिक्योरिटी का बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग सेकंडरी मार्केट में किया जाता है। सेकंडरी मार्केट में इक्विटी मार्केट और डेब्ट मार्केट का समावेश होता है।
डेरिवेटिव्हज मार्केट ( Derivaties Market ):
सेकंडरी मार्केट से फॉरवर्ड मार्केट जरा अलग है। इस बाजार को डेरिवेटिव्हज मार्केट कहके भी जाना जाता है। इस बाजार में सिक्योरिटीज का ट्रेडिंग किया जाता है परंतु उनकी डिलीवरी अथवा पेमेंट भविष्य में देना पड़ती है।
डेरिवेटिव्हस के बाजार में फिलहाल फॉरवर्ड के जो व्यवहार किए जाते है वह फ्यूचर्स और ऑप्शन के व्यवहार है। फ्यूचर्स के मार्केट में स्टंडर्ड सिक्योरिटीज का ही ट्रेडिंग किया जाता है। यह ट्रेडिंग करनेवालो को भविष्य में डिलीवरी अथवा सेटलमेंट व्यवहार चुकता करना पड़ता है। फ्यूचर्स के व्यवहार किसी भी व्यक्तिगत सिक्योरिटी पर अथवा किसी भी इंडेक्स पर हो सकते है। ऑप्शन के विषय मे बताना हो तो भविष्य में डिलीवरी लेने की शर्तों सहित सिक्योरिटीज का भी ट्रेडिंग किया जाता है।
शेयर्स बाजार ( Stock Exchange ):
शेयर्स का बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग शेयर बाजार में किया जाता है। शेयर बाजार एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहाँ शेअर्स की खरीदी का और बिक्री का भाव निश्चित करके व्यवहार किया जाता है। पहले शेयर बाजार एक स्थान हुआ करता था। शेयर बाजार के ट्रेडिंग फ्लोर पर लेन देन किया जाता था। आपने कभी चित्रों में ट्रेडिंग फ्लोर देखा होगा। इस ट्रेडिंग फ्लोर पर लोगो को हाथ ऊंचे करके जोर जोर से चिल्लाकर साथ ही एक दूसरे को संकेत करके व्यवहार करते हुए देखा होगा। शेयर बाजार में व्यवहार करने का यह एक पुराना तरीका था।
यह प्रथा अब अस्तित्व में नही है। फिलहाल वच्युरल ट्रेडिंग फ्लोर में
कंप्यूटर के नेटवर्क का समावेश होता है। इस नेटवर्क के जरिए दुनियाभर के देशों में ट्रेडिंग के लिए इसी सिस्टम का उपयोग किया जाता है।
शेअर बाजार का मूलभूत हेतु खरीददार और विक्रेता के सिक्योरिटीस का व्यवहार पूर्ण होने के लिए जरूरी सुविधा उपलब्ध कराना और जोखिम को कम करना है। शेअर बाजार में प्रायमरी और सेकंडरी ऐसे दो बाजार होते है। प्रायमरी मार्केट में नई सिक्योरिटीज इश्यू की जाती है और फिर उनका एक अस्तित्व निर्माण होने के बाद उन सिक्योरिटीज का व्यवहार सेकंडरी मार्केट में होता है। शेअर बाजार के माध्यम से यह व्यवहार पूरा होता है।
भारतीय स्टॉक एक्सचेंज
( Stock Exchanges In India ):
भारत मे कुल 24 स्टॉक एक्सचेंज है। इन सभी को भारत सरकार ने मान्यता दी है। उनमे से सबसे बड़े और महत्व के बाजार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( nse ) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ( bse )का समावेश होता है। भारत के शेअर बाजार में हर दिन होनेवाले ट्रेडिंग में बड़े पैमाने की ट्रेडिंग nse और bse के जरिये ही होती है
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज- एन, एस, ई
(National Stock Exchange- N, S, E ):
1994 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज शुरू किया गया। यह एक्सचेंज शुरू करने के पीछे का हेतु आगे दिया है।
(1)*.... राष्टीय स्तर पर इक्विटी डेब्ट और इन जैसे अन्य इंस्टुमेंट का व्यवहार कर पाना ।
(2)*... देश भर के निवेशकों को साथ मे व्यवहार करने का मौका प्राप्त करना।
(3)*.... सोक्योरिटीस के व्यवहार में आसानी लाने के लिए। व्यवहार कार्यक्षम होना चाहिए इसीलिए और उनमें पारदर्शकता आए इसलिए।
(4)*... व्यवहार के सेटलमेंट साइकिल अर्थात कालावधि कम करने के लिए।
(5)*.... सिक्योरिटीस के मार्केट के उद्देशों को अंतर्राष्टीय स्तर पर लाने के लिए। यह एक्सचेंज बिना ट्रेडिंग रिंग वाले राष्टीय स्तर के कप्यूटराइज शेअर बाजार के ही स्वरूप में रहे इसीलिए।
यह एक्सचेंज 2 हिस्सो में विभाजित किया है। एक कैपिटल मार्केट और दूसरा होलसेल डेब्ट मार्केट।
कैपिटल मार्केट के हिस्सों में इक्विटी शेअर्स, कन्वर्टिबल डिबेंचर्स और नॉन कन्वर्टिबल डिबेंचर्स का समावेष होता है। होलसेल डेब्ट मार्केट में सरकारी डेब्ट , जाहिर क्षेत्र की कंपनीयो के बॉन्ड, कमर्शियल पेपर और डेब्ट के अन्य इंस्टुमेंट के उच्च कीमत के व्यवहारों का कामकाज होता है। कैपिटल मार्केट से सबंधित ट्रेडिंग मेंबर्स मुम्बई में स्थापित किए गए मध्यस्थ कंप्यूटर के द्वारा जुड़े होते है। इसके लिए वेरी स्मॉल अपर्चर टर्मिनल्स याने की वी-सेट का उपयोग किया जाता है। उसी तरह होलसेल डेब्ट मार्केट से सम्बंधित ट्रेडिंग मेंबर भी मुम्बई में स्थापित हुए मध्यस्थ कंप्यूटर के जरिए हाईस्पीड लाइंस के द्वारा एक दूसरे से सबन्ध जोड़ते है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज आर्डर पर आधारित सिस्टम का उपयोग करता है उनके सिस्टम में ट्रेडिंग मेंबर द्वारा आर्डर दिया जाता है। तब अपने आप आर्डर कन्फर्मेशन स्लिप अर्थात आर्डर दिया जाता है यह निर्देशित करने वाली रसीद तैयार की जाती है। उसमें दी हुई सिक्योरिटीस की संख्या,कौनसी कीमत पर निवेशक सिक्योरिटीज बेचना चाहते है और सामने से किसी भी पक्ष ने उनकी खरीद की हो तो उस पक्ष का कोड नम्बर भी इस स्लिप में दर्ज किया जाती है। इस तरह का यह सिस्टीम है।
एन, एस, ई में स्क्रिप्ट को उसके प्रतीक (चिन्ह) से पहचाना जाता है। उदा, इंफोसिस टेक् का प्रतीक (चिन्ह) Infosystch है। एन, एस, ई का इंडेक्स निफ़्टी है।
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज-बी,एस, ई
( Bombay stock Exchange- B S E ):
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज एशिया का सबसे पुराना शेअर बाजार है। यह बी,एस, ई, के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। 1875 में द नेटिव शेअर अंड स्टॉक ब्रोकर असोसिएशन के नामसे इसकी स्थापना हुई थी भारत सरकार से मान्यता हासिल करनेवाला यह देश का पहला एक्सचेंज है। भारत सरकार ने इसे 1956 में सिक्योरिटीस कॉन्ट्रक्ट रेग्युलेशन एक्ट 1956 के अंतर्गत स्थायी स्वरूप की मान्यता दी थी।यह एक्सचेंज भारतीय कैपिटल मार्केट को विकसित करने में मुख्य और महत्व की भूमिका निभाता है बी,एस, ई, का इंडेक्स सेंसेक्स है और इस इंडेक्स पर विश्वभर की नजर होती है।
डेरिवेटिव्हस इक्विटी और डेब्ट इंस्टुमेंट में ट्रेडिंग करने के लिए यह एक्सचेंज कार्यक्षम और पारदर्शक बाजार तैयार करता है।
बी,एस, ई में स्क्रिप्ट को उनके कोड नम्बर से पहचाना जाता है। उदा, इंफोसिस टेक् का बी,एस, ई कोड नम्बर 500209 है।
ट्रेडिंग करने का तरीका (Treding Styles):
इस बाजार में मुख्य रूप से 3 प्रकार से ट्रेडिंग होती है। एक डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग, दूसरी डे ट्रेडिंग और तीसरी डेरिवेटिव्हज ट्रेडिंग।
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग
( Delivery Based Trede ):
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग में व्यवहार करने के बाद सामान्यरूप से जिनते दिनों में सेटलमेंट करने की व्यवहस्था बाजार के मंजिमेन्ट द्वारा निश्चित की गई है। उस तरह से शेअर्स की डिलीवरी और उसका पेमेंट किया जाता है। डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग में पहले शेअर्स की खरीदी की जाती है और बाद में भाव बढ़ने पर शेअर्स को बेचा जाता है।
डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग की मर्यादा
( Limitations of Delivery Based Treding ):
*.... मंदी के माहोल में डिलीवरी पर आधारित ट्रेडिंग नही की जा सकती।
*.... शार्ट सेलिंग नही कर सकते।
डे ट्रेडिंग। ( Day Treding ):
डे ट्रेडिंग याने दिन के दरम्यान व्यवहार करके पोजिशन खड़ी करना और दिन के अंत मे खड़ी की हुई पोजिशन बन्द करना। डे ट्रेडर को दिन के दरम्यान किए हुए ट्रेडिंग को बाजार बंद होने से पूर्व ही पूरा करना पड़ता है। डे ट्रेडर दिन के दरम्यान, शेअर्स की कीमत में होनेवाले उतार-चढ़ाव में से मुनाफा कमाने का प्रयत्न करता है परंतु दिन के अंत मे उसे अपनी सभी पोजिशन निकालनी पड़ती है अर्थात बन्द करनी पड़ती है।
डेरिवेटिव्हज ट्रेडिंग
( Derivatives Treding ):
डेरिवेटिव्हज एक ऐसा प्रोडक्ट है जिनकी कीमत एक या अनेक कीमतों के विचार करके निश्चित की जाती है जिसे हम बेस (अंडरलाइन असेट) कहके जानते है। डेरिवेटिव्हज का ट्रेडिंग कॉन्ट्रक्ट की तरह से ही होता है। अंडरलाइन असेट यह इक्विटी,फॉरेक्स,कमोडिटी या अन्य कोई भी असेट हो सकते है। डेरिवेटिव्हज कॉन्ट्रक्ट में कई व्हेरिअन्त होते है। दूसरे शब्दों में बताना हो तो उसमें ट्रेडिंग करने के लिए अलग अलग मीडियम है। इन मीडियम में से प्रचलित मीडियम में फ्यूचर्स कॉन्ट्रक्ट और ऑप्शन कॉन्ट्रक्ट का समावेष होता है। इनमे ट्रेडिंग करनेवाले मुख्य रूप से स्पेक्युलेटर्स, हेजर्स और आर्बिटेजर्स होते है।

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