Gyan marg
भक्ति से ही मानव शरीर का मुक्ति सम्भव है जबतक सत। मार्ग में विलीन नही होगा तबतक मुक्ति सम्भव नही है
नमस्कार दोस्तो मैं अपने चैनल प्रेमगेन्द्रे में आपका हार्दिक स्वागत करता हु तथा आप को इस ज्ञान मार्ग से अवगत कराता हु जय सत सत नाम मे मुक्ति का राज छुपा है
इस नाम के बिना कोई भी पार नही लगा सकता है तथा इस नाम का जाप देवी और देवता गण एवं मानव ने भी जप किया है
यह चालीस मानव को अनेक परसनियो से भी बचाता है जो भी इस चालीसा का पाठ करता उसके सारी दुःख तकलीफ दूर हो जाता है अतः आप सभी भाइयो से निवेन्दन है आप इसे स्वयं मन की शांति के लिए पाठ कर सकते है
भक्ति से ही मानव शरीर का मुक्ति सम्भव है जबतक सत। मार्ग में विलीन नही होगा तबतक मुक्ति सम्भव नही है
नमस्कार दोस्तो मैं अपने चैनल प्रेमगेन्द्रे में आपका हार्दिक स्वागत करता हु तथा आप को इस ज्ञान मार्ग से अवगत कराता हु जय सत सत नाम मे मुक्ति का राज छुपा है
इस नाम के बिना कोई भी पार नही लगा सकता है तथा इस नाम का जाप देवी और देवता गण एवं मानव ने भी जप किया है
यह चालीस मानव को अनेक परसनियो से भी बचाता है जो भी इस चालीसा का पाठ करता उसके सारी दुःख तकलीफ दूर हो जाता है अतः आप सभी भाइयो से निवेन्दन है आप इसे स्वयं मन की शांति के लिए पाठ कर सकते है
।। गुरु घासीदास चालीसा ।।
आदि नाम सतनाम हैं, सतहि है जग सार ।
सतनाम के जपन से,मनहर उतरे पार ।।
श्री गुरु घासीदास को, पग बन्दव कर जोर ।
चालीसा रचना करूँ,सुरता देवहू मोर ।।
सतनाम समनाम नहि, सब नामों में सार ।
सत के कारण संत जन,उतरव भव से पार ।।
आदि नाम सतनाम हैं, सतहि है जग सार ।
सतनाम के जपन से,मनहर उतरे पार ।।
श्री गुरु घासीदास को, पग बन्दव कर जोर ।
चालीसा रचना करूँ,सुरता देवहू मोर ।।
सतनाम समनाम नहि, सब नामों में सार ।
सत के कारण संत जन,उतरव भव से पार ।।
चौपाई
(1)... जय गुरु घासीदास हि ज्ञानी,संतजनों में रहे विज्ञानी।
(2).. जन्म गिरौदपुरी में लीन्हा,लीला करी अति सुख दीन्हा ।
(3)...चोरी करना पापहि भाई, बाल सखा के कहिये जाई ।
(4).. जब तुम भयऊ किशोरावस्था, ब्याह कियो सफुरा से सत्था ।
(5).. एक दिन महंगू कहियो जाई, बुढ़ापा में कारज न होई ।
(6)...पितु आज्ञा सिर धारण किन्ही,उदर भरण हिट कारज किन्ही ।
(7)..अदभुत महिमा तँह दिखायो, अध्धर नांगर बैल चलायो ।
(8).. महिमा देख तुंहर गोसाई,आकर किसान शीश नवाई ।
(9)...पुनि अपने गृह गयो लिखाई,षोडस पूजन कीन्ह गुसाई ।
(10).. परि दुष्काल गिरौदपुरी में, चलेउ घासी संतन संग में ।
(11).. नगर सारंगढ़ में घासी आयो,सतं ज्ञान सबको समझायो ।
(12)..सारंगढ़ एक योगी आयो,सत ज्ञान सबको समझायो ।
(13)... एक दिन घासी सुनयो जाई, माया मोह से चित्त हटाई ।
(14)... सुनत ज्ञान योगी के वचना, मिट गये अंधकार जिमि सपना ।
(15)...सत ज्ञान में है मतवाला, सन्तन त्यागउ सफुरा बाला ।
(16)..घूमत गिरौदपुरी में आयऊ,निज परिवार सुख से चलायऊ ।
(17)...जंगल गयऊ लकड़ी काटन, बालक अम्मर करेऊ पलायन ।
(18)... तीन साल सफुरा ने जाये, आधिव्याधि में प्राण गंवाये ।
(19)... पुत्रहि शोक में सफुरा माता,प्राणायाम कीन छोड़ के नाता ।
(20)... नारी पुत्रहि होई वियोगी,निकले घासी होकर योगी ।
(21)..जंगल सोनाखान में गयऊ,तप करने में ध्यान लगयेऊ सांचे ।
(22)..औरा-धौरा वृक्ष के नीचे,धुनि अखण्ड लगयेऊ सांचे ।
(23)..आसन मध्य लगायेऊ घासी,सत सत जपत भये घासी ।
(24)..छः महीना तप पूरण कीजे,सत बोध घासी उर उपजै ।
(25)..दर्शन सहस्त्र धारा का कीन्हा, सत कुण्ड में स्नान कीन्हा ।
(26)...सत्यपुरुष नरसिंह रूप धरि के,गर्जेऊ भारी तीरहि आपके ।
(27)...बोले घासी सुनिये स्वामी, यह तन अर्पण करिये स्वामी ।
(28)... निर्भय वाणी घासी के सुनिके, सत्यपुरुष दर्शन दीन्हे आके ।
(29)...सत ज्ञान घासी को बुझावा, दृढ़ विश्वास सत में पावा ।
(30)... मुनि घासी गवके निज भवना, सब सन्तन को सुनायउ बचना ।
(31)..मृतप्राय गाय जीवन दीन्हा, दुखी दरिद्र के दुख दूर कीन्हा ।
(32)...जाइ श्मशान जगायउ सफुरा, सतनाम कहि उठे सफुरा ।
(33)...यह महिमा देखे नर नारी, होइ शिष्य सेवई नर नारी ।
(34)...रात्रि स्वप्न घासी को भयऊ, सतनाम परचारे करेऊ ।
(35)...छोड़ि गिरौद भण्डारहि आवा, होइ शिष्य सब मंगल गावा ।
(36).घूम घूम उपदेशहि गाई, सतनाम की महिमा छाई ।
(37)...सर्व जानित के लोगन आई, स्तनामके भये अनुयाई ।
(38)...सतनाम सब जपत सुभागे, सतनामी के भाग्यहि जागे ।
(39)... घासी सदा रहे सतधारी,सतनाम की महिमा न्यारी ।
(40)... जो पढ़िहि घासी चालीसा, पद निर्वाण पावहि सब हंसा।
(2).. जन्म गिरौदपुरी में लीन्हा,लीला करी अति सुख दीन्हा ।
(3)...चोरी करना पापहि भाई, बाल सखा के कहिये जाई ।
(4).. जब तुम भयऊ किशोरावस्था, ब्याह कियो सफुरा से सत्था ।
(5).. एक दिन महंगू कहियो जाई, बुढ़ापा में कारज न होई ।
(6)...पितु आज्ञा सिर धारण किन्ही,उदर भरण हिट कारज किन्ही ।
(7)..अदभुत महिमा तँह दिखायो, अध्धर नांगर बैल चलायो ।
(8).. महिमा देख तुंहर गोसाई,आकर किसान शीश नवाई ।
(9)...पुनि अपने गृह गयो लिखाई,षोडस पूजन कीन्ह गुसाई ।
(10).. परि दुष्काल गिरौदपुरी में, चलेउ घासी संतन संग में ।
(11).. नगर सारंगढ़ में घासी आयो,सतं ज्ञान सबको समझायो ।
(12)..सारंगढ़ एक योगी आयो,सत ज्ञान सबको समझायो ।
(13)... एक दिन घासी सुनयो जाई, माया मोह से चित्त हटाई ।
(14)... सुनत ज्ञान योगी के वचना, मिट गये अंधकार जिमि सपना ।
(15)...सत ज्ञान में है मतवाला, सन्तन त्यागउ सफुरा बाला ।
(16)..घूमत गिरौदपुरी में आयऊ,निज परिवार सुख से चलायऊ ।
(17)...जंगल गयऊ लकड़ी काटन, बालक अम्मर करेऊ पलायन ।
(18)... तीन साल सफुरा ने जाये, आधिव्याधि में प्राण गंवाये ।
(19)... पुत्रहि शोक में सफुरा माता,प्राणायाम कीन छोड़ के नाता ।
(20)... नारी पुत्रहि होई वियोगी,निकले घासी होकर योगी ।
(21)..जंगल सोनाखान में गयऊ,तप करने में ध्यान लगयेऊ सांचे ।
(22)..औरा-धौरा वृक्ष के नीचे,धुनि अखण्ड लगयेऊ सांचे ।
(23)..आसन मध्य लगायेऊ घासी,सत सत जपत भये घासी ।
(24)..छः महीना तप पूरण कीजे,सत बोध घासी उर उपजै ।
(25)..दर्शन सहस्त्र धारा का कीन्हा, सत कुण्ड में स्नान कीन्हा ।
(26)...सत्यपुरुष नरसिंह रूप धरि के,गर्जेऊ भारी तीरहि आपके ।
(27)...बोले घासी सुनिये स्वामी, यह तन अर्पण करिये स्वामी ।
(28)... निर्भय वाणी घासी के सुनिके, सत्यपुरुष दर्शन दीन्हे आके ।
(29)...सत ज्ञान घासी को बुझावा, दृढ़ विश्वास सत में पावा ।
(30)... मुनि घासी गवके निज भवना, सब सन्तन को सुनायउ बचना ।
(31)..मृतप्राय गाय जीवन दीन्हा, दुखी दरिद्र के दुख दूर कीन्हा ।
(32)...जाइ श्मशान जगायउ सफुरा, सतनाम कहि उठे सफुरा ।
(33)...यह महिमा देखे नर नारी, होइ शिष्य सेवई नर नारी ।
(34)...रात्रि स्वप्न घासी को भयऊ, सतनाम परचारे करेऊ ।
(35)...छोड़ि गिरौद भण्डारहि आवा, होइ शिष्य सब मंगल गावा ।
(36).घूम घूम उपदेशहि गाई, सतनाम की महिमा छाई ।
(37)...सर्व जानित के लोगन आई, स्तनामके भये अनुयाई ।
(38)...सतनाम सब जपत सुभागे, सतनामी के भाग्यहि जागे ।
(39)... घासी सदा रहे सतधारी,सतनाम की महिमा न्यारी ।
(40)... जो पढ़िहि घासी चालीसा, पद निर्वाण पावहि सब हंसा।
गुरु घासीदास चालीसा सम्पूर्ण हुआ
जय सतनाम जय सतनाम जय सतसागर
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