इंवेशटिंग फ़ॉर कंपनी ट्रेक रिकॉर्ड
फंडामेंटल अनालिसिस
हेलो दोस्तो मैं प्रेमगेन्द्रे अपने इस ब्लॉग में शेअर्स बाजार में शेअर्स का कंपनी में महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में बताया हु जैसे कि कोई कंपनी का शेअर्स खरीदना है तो उसके कंपनी का जानकारी होना बहुत ही महत्वपूर्ण है तभी हम कंपनी के रिकॉर्ड के बारे में अचछा जानकारी रहेगा तभी शेअर्स से हमे मुनाफा मिलेगा धन्यवाद दोस्तो
( Fundamental Analysis ):
सिस्टमेटिक अनालीसिस ( Systematic Analysis)
हमे नीचे दिए गए मुद्दों का ठीक तरह से विश्लेशण करना जरूरी है। फुण्डामेंटल अनालीसिस को तीन विभाग में बाँटा गया है। पहला इंडस्ट्रीयल अनालीसिस,दूसरा कॉरपोरेट अनालीसिस और तीसरा फाइनेंशियल अनालीसिस।
(१)*.... इंडस्ट्रियल अनालीसिस (Industrial Analysis ):
जो कंपनीया एक ही अथवा एक जैसे प्रोडक्ट बनाती है,वो सभी एक ही सेक्टर में आती है। एक ही सेक्टर में आनेवाली कंपनीयो को अपना उत्पादन खर्च उत्पन्न की संख्या उससे होनेवाला फायदा,इन सब का तालमेल उसी सेक्टर के दूसरी कंपनीयो से करना जरूरी है।
किसी सेक्टर में उद्योग करने से पहले हमें प्रथम उस सेक्टर में सरकार के मनसूबे कैसे है, उस उद्योग का भविष्य अच्छा है या नही,यह देखना जरूरी है। इसे इंडस्ट्रीयल अनालीसिस अर्थात कंपनी का ठीक से विश्लेशण करना कहते है।
उदा://
रुपए के डीवैल्युएशन से एक्सपोर्ट कंपनी को बहुत फायदा होता है। अपनी वस्तुए विदेश में बहुत सस्ती होती है और उससे एक्सपोर्ट कंपनी का धन्दा बढ़ता है,इसलिए वो मुनाफे में जाति है।
(२)*.... कॉरपोरेट अनालीसिस
( Corporate Analysis ):
आप जब कॉरपोरेट अनालीसिस करते है तब उसमें आगे दी हुई बाते आती है।
★... पिछले वर्ष कंपनी का कामकाज कैसा था।
★... चालू वर्ष में कामकाज कैसे चल रहा है और भविष्य में कंपनी की कोई विकास की योजना है, तो उस योजना का खर्च कितना है इत्यादि।
★.. अपने प्रतिस्पर्धा कंपनी का काम और मुनाफा कमाने की क्षमता और अपने कंपनी का काम और मुनाफे का तालमेल करना चाहिये।
★... व्यवस्थापक का कंपनी का व्यवस्थापक करने की क्षमता ठीक है या नही यह देखना चाहिए। इस विश्लेशण को कॉरपोरेट अनालीसिस कहते है।
(३)*..फाइनांशियल अनालीसिस
( Financial Analysis ):
किसी कंपनी का कामकाज अच्छा है या नही और उनके शेअर का भाव बढेगा या नही यह जानने के लिए हमे कंपनी का आर्थिक विश्लेशण अर्थात फाइनेंसियल अनालीसिस करना पड़ता है। उसके लिए हमे कंपनी के वित्तीय मापदण्डो ( फाइनेंसियल पैरामीटर्स ) को देखना पड़ता है। इनमे शेअर डीड हर इक्विटी शेअर के ऊपर का फायदा,इक्विटी शेअर का प्रमाण इन सब का अध्ययन करना पड़ता है। इससे हमें भविष्य में उन शेअर का भाव बढेगा या नही इसका अंदाजा आ सकता है। इसे फाइनेंसियल अनालीसिस कहते है।
उसके लिए हमे कंपनी के फाइनांशियल स्टेटमेंट जैसे कि बैलेंस शीट ( balance Sheet), प्रॉफिट अंड लॉस एकाउंट ( profit and Loss Account)
और कंपनी का वार्षिक अहवाल ( Annual Report)
देखना चाहिए।
कंपनी का वार्षिक अहवाल
( Annual Report of a Company ):
कंपनी का वार्षिक अहवाल,हरसाल कंपनी के व्यवस्थापकों द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसमें कंपनी के असेट ( Assets ), लायबिलिटी ( liability), रेवेन्यू ( Revenue),खर्च,कमाई,बीते वर्ष के दौरान कंपनी के कामकाज की प्रगति कैसी थी,कंपनी का मुनाफा कमाने की क्षमता कैसे थी,इत्यादि की जानकारी मिलती है। साथ ही शेअर धारकों को मिलनेवाले डिविडेंड इत्यादि का पता चलता है।
किसी कंपनी को अगर एक उद्द्योग में घाटा हुआ तो उसका कारण कंपनी को उस वर्ष के वार्षिक अहवाल में देना पड़ता है। साथ ही भविष्य में कंपनी के कामकाज को सुधारने के लिए,मुनाफा कमाने की क्षमता बढ़ाने के लिए कंपनी ने कौनसे उपाय किए है इसकी भी जानकारी अहवाल में देनी पड़ती है।
हर निवेशक को कंपनी का हिसाब वर्ष पूरा होने के बाद 6 महीने के अंदर वार्षिक अहवाल दिया जाता है।कंपनी का अहवाल कंपनी की पूरी जानकारी देने का साधन है।
हर निवेशक को कंपनी का वार्षिक अहवाल पड़ना चाहिए और उनके नीचे दिए मुद्दों ध्यान में रखने चाहिए।
डायरेक्टर का रिपोर्ट और चेअरमन की स्टेटमेंट जिसमे वर्तमान और भविष्य के कामकाज की जानकारी मिलती है।
★. कंपनी का परफॉर्मन्स कैसा था।
★. ऑडिटर्स का रिपोर्ट देखना चाहिए।
★.प्रॉफिट अंड लॉस एकाउंट देखिए।
★.बैलेंस शीट और उसके साथ के नोट्स देखना चाहिए।
कंपनी की बैलेंस शीट
( Balance Sheet of a Company ):
बैलेंस शीट कंपनी की फाइनेंसियल स्थिति ( Financial Position) दर्शाती है और कंपनीज एक्ट 1956 के तहत कंपनी का एकाउंट फॉर्म अथवा रिपोर्ट फॉर्म नीचे दर्शाता गया है इस तरह होना चाहिए।
Balance sheet: Account form:
(१)**. Liabilities
Share capital
Reserves and surplus
Secured loans
Unsecured loans
Current liabilities & provisions
(२)*... Asset
Fixed asset
Investments
Current assets, loans & advances
Miscellaneous expenditure
Balance sheet report form
(१)...sources of funds
(।).shareholders funds
(a)..share capital
(b).. Reserves & surplus
(२)....... loan funds
(a). Secured loans
(b). Unsecured loan
(।।). application of funds
(a)...fixed assets
(b)...investments
(c).. current assets, loans and advances
Less:- current liabilities and provisions
Net current assets
(D).. miscellaneous expenditure and losses
जिम्मेदारी ( Liabilities):
जिम्मेदारी याने आसान शब्दो मे कंपनी को कितने पैसे चुकाने है वह नीचे दिया है।
#..शेअर कैपिटल ( share capital)
#..रिजर्व और सरप्लस ( Reserve & Surplus)
#.. सिक्योर्ड लोन्स ( Secured Loans)
#..अनसिक्योर्ड लोन्स ( unsecured Loans)
#.. करंट लियाबिलिटीज ( Current liabilities )
शेअर केपिटल ( Share Capital)
शेअर केपिटल के मुख्य 2 प्रकार है। इक्विटी कैपिटल और प्रोफरेंशिएल कैपिटल। इक्विटी कैपिटल में मुख्यता: संस्थापक का निवेश होता है। साथ ही इक्विटी शेअर धारकों का भी निवेश होता है। वह कम्पनी के मालिक होते है,
इस कैपिटल पर स्थिर डिविडेंड नही मिलता। प्रोफरेंशिएल शेअर कैपिटल स्थिर डिविडेंड मिलता है।
रिजर्व और सरप्लस
( Reserve & Surplus ):
रिजर्व और सरप्लस इसमे कम्पनी को होनेवाला फायदा ट्रांसफर किया जाता है।
कम्पनी के शेयर धारकों को डिविडेंड और ब्याज देने के बाद बचा हुआ फायदा रिजर्व और सरप्लस के खाते में ट्रांसफर किया जाता है और फिर उन पैसों से कम्पनी को भविष्य में होनेवाले खर्च चलाने पड़ते है।
सिक्योर्ड लोन्स ( secured Loans):
सामान्यतः कंपनी डिबेंचर के माध्यम से अथवा फाइनांशियल इंस्टीटयूशन, बैंक से कर्ज लेती है। इसके लिए कंपनी को संपशीर्वक सुरक्षा देनी पड़ती है। उसे सिक्योर्ड लोन्स कहते है।
अनसिक्योर्ड लोन्स (Unsecured Loans ):
जिस कर्ज पर कंपनी को सपाशीर्वक सुरक्षा ( collateral security) नही देनी पड़ती उसे अनसिक्योर्ड लोन्स कहते है। यह कर्ज फिक्स डिपॉज़िट,प्रमोटर्स लोन्स ,एडवांस इंटरकॉर्पोरेट और बैंक उपलब्ध कराते है।
करंट लियाबिलिटीएस और प्रोविजन
( Current Liabilities and Provision ):
इसमे सप्लायर्स,सर्विस प्रोवाइडर्स,एडवांस पेमेंट,अन्क्लेमड डिविडेंड, टैक्स इनका समावेश होता है करंट लियाबिलिटीएस कंपनी को व्यवहार के एक साल में पूरी करनी पड़ती है
कंपनी के असेट्स (assets):
कंपनी के असेट यह कंपनी की प्रगतिशील क्षमता दिखानेवाला आईना है। आगे कंपनी के असेट के प्रकार दिए है।
#...फिक्स असेट्स ( Fix Assets)
#..निवेश (Investment)
#...करंट एसेट्स,लोन अंड एडवांसेज ( Current Assets Loans & Advances)
#... मिसलिनीयम एक्स पेंसेस और लासेस ( Miscellinious, expenditure & Losses):
फिक्स असेट्स ( fixed assets ):
कंपनी के उत्पादन की जगह, मशीनरी,इत्यादि में जो निवेश किया जाता है उसे अचल संपत्ति (फिक्स असेट्स) कहते है। वह कई वर्षों के लिए स्थिर होता है। उन निवेश का दूसरे व्यवहार के लिए उपयोग नही होता।
निवेश ( investment):
यह निवेश बहुत सी कंपनीया करती है। जैसे कि गवर्मेंट बांड,इंफ्रास्ट्रक्चर बांड,बैंक फिक्स डिपॉज़िट,इनका उपयोग कंपनी को कोलेटरल सिक्योरिटी लेने के लिए होता है।
करंट असेट्स लोन अंड एडवांसेज
( Current Assets Loans & Advances):
इसमे नगद रुपये और कंपनी के ऐसे साधनों का समावेश होता है। जिनका कंपनी के उद्दोग के एक वर्ष में नगद रुपयों में बदला जाता है। उदा, बैंक बैलेंस,डेटर( जिन्होंने कंपनी से उधार पैसे लिए है), इन्वेंटरीज लोन और एडवांस आदि।
मिसलिनीयम एक्सपेंसेस और लासेस
( Miscellinious Expenditure & लोससेस):
जब कंपनी को घाटा होता है। तब कंपनी की इक्विटी अमाउंट कम होती है। परंतु कंपनी के नियमानुसार अगर कंपनी को घाटा हुआ तो वह शेअर कैपिटल में से नही लेना चाहिए। इसलिए शेअर का कुछ हिस्सा बैलेंस शीट के दाई ओर में मिसलिनीयम इक्सपेंसेस के रूप में रखा जाता है और कंपनी को हुआ घाटा बैलेंस शीट के बाई ओर लिख जाता है।
फंडामेंटल अनालिसिस
हेलो दोस्तो मैं प्रेमगेन्द्रे अपने इस ब्लॉग में शेअर्स बाजार में शेअर्स का कंपनी में महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में बताया हु जैसे कि कोई कंपनी का शेअर्स खरीदना है तो उसके कंपनी का जानकारी होना बहुत ही महत्वपूर्ण है तभी हम कंपनी के रिकॉर्ड के बारे में अचछा जानकारी रहेगा तभी शेअर्स से हमे मुनाफा मिलेगा धन्यवाद दोस्तो
( Fundamental Analysis ):
सिस्टमेटिक अनालीसिस ( Systematic Analysis)
हमे नीचे दिए गए मुद्दों का ठीक तरह से विश्लेशण करना जरूरी है। फुण्डामेंटल अनालीसिस को तीन विभाग में बाँटा गया है। पहला इंडस्ट्रीयल अनालीसिस,दूसरा कॉरपोरेट अनालीसिस और तीसरा फाइनेंशियल अनालीसिस।
(१)*.... इंडस्ट्रियल अनालीसिस (Industrial Analysis ):
जो कंपनीया एक ही अथवा एक जैसे प्रोडक्ट बनाती है,वो सभी एक ही सेक्टर में आती है। एक ही सेक्टर में आनेवाली कंपनीयो को अपना उत्पादन खर्च उत्पन्न की संख्या उससे होनेवाला फायदा,इन सब का तालमेल उसी सेक्टर के दूसरी कंपनीयो से करना जरूरी है।
किसी सेक्टर में उद्योग करने से पहले हमें प्रथम उस सेक्टर में सरकार के मनसूबे कैसे है, उस उद्योग का भविष्य अच्छा है या नही,यह देखना जरूरी है। इसे इंडस्ट्रीयल अनालीसिस अर्थात कंपनी का ठीक से विश्लेशण करना कहते है।
उदा://
रुपए के डीवैल्युएशन से एक्सपोर्ट कंपनी को बहुत फायदा होता है। अपनी वस्तुए विदेश में बहुत सस्ती होती है और उससे एक्सपोर्ट कंपनी का धन्दा बढ़ता है,इसलिए वो मुनाफे में जाति है।
(२)*.... कॉरपोरेट अनालीसिस
( Corporate Analysis ):
आप जब कॉरपोरेट अनालीसिस करते है तब उसमें आगे दी हुई बाते आती है।
★... पिछले वर्ष कंपनी का कामकाज कैसा था।
★... चालू वर्ष में कामकाज कैसे चल रहा है और भविष्य में कंपनी की कोई विकास की योजना है, तो उस योजना का खर्च कितना है इत्यादि।
★.. अपने प्रतिस्पर्धा कंपनी का काम और मुनाफा कमाने की क्षमता और अपने कंपनी का काम और मुनाफे का तालमेल करना चाहिये।
★... व्यवस्थापक का कंपनी का व्यवस्थापक करने की क्षमता ठीक है या नही यह देखना चाहिए। इस विश्लेशण को कॉरपोरेट अनालीसिस कहते है।
(३)*..फाइनांशियल अनालीसिस
( Financial Analysis ):
किसी कंपनी का कामकाज अच्छा है या नही और उनके शेअर का भाव बढेगा या नही यह जानने के लिए हमे कंपनी का आर्थिक विश्लेशण अर्थात फाइनेंसियल अनालीसिस करना पड़ता है। उसके लिए हमे कंपनी के वित्तीय मापदण्डो ( फाइनेंसियल पैरामीटर्स ) को देखना पड़ता है। इनमे शेअर डीड हर इक्विटी शेअर के ऊपर का फायदा,इक्विटी शेअर का प्रमाण इन सब का अध्ययन करना पड़ता है। इससे हमें भविष्य में उन शेअर का भाव बढेगा या नही इसका अंदाजा आ सकता है। इसे फाइनेंसियल अनालीसिस कहते है।
उसके लिए हमे कंपनी के फाइनांशियल स्टेटमेंट जैसे कि बैलेंस शीट ( balance Sheet), प्रॉफिट अंड लॉस एकाउंट ( profit and Loss Account)
और कंपनी का वार्षिक अहवाल ( Annual Report)
देखना चाहिए।
कंपनी का वार्षिक अहवाल
( Annual Report of a Company ):
कंपनी का वार्षिक अहवाल,हरसाल कंपनी के व्यवस्थापकों द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसमें कंपनी के असेट ( Assets ), लायबिलिटी ( liability), रेवेन्यू ( Revenue),खर्च,कमाई,बीते वर्ष के दौरान कंपनी के कामकाज की प्रगति कैसी थी,कंपनी का मुनाफा कमाने की क्षमता कैसे थी,इत्यादि की जानकारी मिलती है। साथ ही शेअर धारकों को मिलनेवाले डिविडेंड इत्यादि का पता चलता है।
किसी कंपनी को अगर एक उद्द्योग में घाटा हुआ तो उसका कारण कंपनी को उस वर्ष के वार्षिक अहवाल में देना पड़ता है। साथ ही भविष्य में कंपनी के कामकाज को सुधारने के लिए,मुनाफा कमाने की क्षमता बढ़ाने के लिए कंपनी ने कौनसे उपाय किए है इसकी भी जानकारी अहवाल में देनी पड़ती है।
हर निवेशक को कंपनी का हिसाब वर्ष पूरा होने के बाद 6 महीने के अंदर वार्षिक अहवाल दिया जाता है।कंपनी का अहवाल कंपनी की पूरी जानकारी देने का साधन है।
हर निवेशक को कंपनी का वार्षिक अहवाल पड़ना चाहिए और उनके नीचे दिए मुद्दों ध्यान में रखने चाहिए।
डायरेक्टर का रिपोर्ट और चेअरमन की स्टेटमेंट जिसमे वर्तमान और भविष्य के कामकाज की जानकारी मिलती है।
★. कंपनी का परफॉर्मन्स कैसा था।
★. ऑडिटर्स का रिपोर्ट देखना चाहिए।
★.प्रॉफिट अंड लॉस एकाउंट देखिए।
★.बैलेंस शीट और उसके साथ के नोट्स देखना चाहिए।
कंपनी की बैलेंस शीट
( Balance Sheet of a Company ):
बैलेंस शीट कंपनी की फाइनेंसियल स्थिति ( Financial Position) दर्शाती है और कंपनीज एक्ट 1956 के तहत कंपनी का एकाउंट फॉर्म अथवा रिपोर्ट फॉर्म नीचे दर्शाता गया है इस तरह होना चाहिए।
Balance sheet: Account form:
(१)**. Liabilities
Share capital
Reserves and surplus
Secured loans
Unsecured loans
Current liabilities & provisions
(२)*... Asset
Fixed asset
Investments
Current assets, loans & advances
Miscellaneous expenditure
Balance sheet report form
(१)...sources of funds
(।).shareholders funds
(a)..share capital
(b).. Reserves & surplus
(२)....... loan funds
(a). Secured loans
(b). Unsecured loan
(।।). application of funds
(a)...fixed assets
(b)...investments
(c).. current assets, loans and advances
Less:- current liabilities and provisions
Net current assets
(D).. miscellaneous expenditure and losses
जिम्मेदारी ( Liabilities):
जिम्मेदारी याने आसान शब्दो मे कंपनी को कितने पैसे चुकाने है वह नीचे दिया है।
#..शेअर कैपिटल ( share capital)
#..रिजर्व और सरप्लस ( Reserve & Surplus)
#.. सिक्योर्ड लोन्स ( Secured Loans)
#..अनसिक्योर्ड लोन्स ( unsecured Loans)
#.. करंट लियाबिलिटीज ( Current liabilities )
शेअर केपिटल ( Share Capital)
शेअर केपिटल के मुख्य 2 प्रकार है। इक्विटी कैपिटल और प्रोफरेंशिएल कैपिटल। इक्विटी कैपिटल में मुख्यता: संस्थापक का निवेश होता है। साथ ही इक्विटी शेअर धारकों का भी निवेश होता है। वह कम्पनी के मालिक होते है,
इस कैपिटल पर स्थिर डिविडेंड नही मिलता। प्रोफरेंशिएल शेअर कैपिटल स्थिर डिविडेंड मिलता है।
रिजर्व और सरप्लस
( Reserve & Surplus ):
रिजर्व और सरप्लस इसमे कम्पनी को होनेवाला फायदा ट्रांसफर किया जाता है।
कम्पनी के शेयर धारकों को डिविडेंड और ब्याज देने के बाद बचा हुआ फायदा रिजर्व और सरप्लस के खाते में ट्रांसफर किया जाता है और फिर उन पैसों से कम्पनी को भविष्य में होनेवाले खर्च चलाने पड़ते है।
सिक्योर्ड लोन्स ( secured Loans):
सामान्यतः कंपनी डिबेंचर के माध्यम से अथवा फाइनांशियल इंस्टीटयूशन, बैंक से कर्ज लेती है। इसके लिए कंपनी को संपशीर्वक सुरक्षा देनी पड़ती है। उसे सिक्योर्ड लोन्स कहते है।
अनसिक्योर्ड लोन्स (Unsecured Loans ):
जिस कर्ज पर कंपनी को सपाशीर्वक सुरक्षा ( collateral security) नही देनी पड़ती उसे अनसिक्योर्ड लोन्स कहते है। यह कर्ज फिक्स डिपॉज़िट,प्रमोटर्स लोन्स ,एडवांस इंटरकॉर्पोरेट और बैंक उपलब्ध कराते है।
करंट लियाबिलिटीएस और प्रोविजन
( Current Liabilities and Provision ):
इसमे सप्लायर्स,सर्विस प्रोवाइडर्स,एडवांस पेमेंट,अन्क्लेमड डिविडेंड, टैक्स इनका समावेश होता है करंट लियाबिलिटीएस कंपनी को व्यवहार के एक साल में पूरी करनी पड़ती है
कंपनी के असेट्स (assets):
कंपनी के असेट यह कंपनी की प्रगतिशील क्षमता दिखानेवाला आईना है। आगे कंपनी के असेट के प्रकार दिए है।
#...फिक्स असेट्स ( Fix Assets)
#..निवेश (Investment)
#...करंट एसेट्स,लोन अंड एडवांसेज ( Current Assets Loans & Advances)
#... मिसलिनीयम एक्स पेंसेस और लासेस ( Miscellinious, expenditure & Losses):
फिक्स असेट्स ( fixed assets ):
कंपनी के उत्पादन की जगह, मशीनरी,इत्यादि में जो निवेश किया जाता है उसे अचल संपत्ति (फिक्स असेट्स) कहते है। वह कई वर्षों के लिए स्थिर होता है। उन निवेश का दूसरे व्यवहार के लिए उपयोग नही होता।
निवेश ( investment):
यह निवेश बहुत सी कंपनीया करती है। जैसे कि गवर्मेंट बांड,इंफ्रास्ट्रक्चर बांड,बैंक फिक्स डिपॉज़िट,इनका उपयोग कंपनी को कोलेटरल सिक्योरिटी लेने के लिए होता है।
करंट असेट्स लोन अंड एडवांसेज
( Current Assets Loans & Advances):
इसमे नगद रुपये और कंपनी के ऐसे साधनों का समावेश होता है। जिनका कंपनी के उद्दोग के एक वर्ष में नगद रुपयों में बदला जाता है। उदा, बैंक बैलेंस,डेटर( जिन्होंने कंपनी से उधार पैसे लिए है), इन्वेंटरीज लोन और एडवांस आदि।
मिसलिनीयम एक्सपेंसेस और लासेस
( Miscellinious Expenditure & लोससेस):
जब कंपनी को घाटा होता है। तब कंपनी की इक्विटी अमाउंट कम होती है। परंतु कंपनी के नियमानुसार अगर कंपनी को घाटा हुआ तो वह शेअर कैपिटल में से नही लेना चाहिए। इसलिए शेअर का कुछ हिस्सा बैलेंस शीट के दाई ओर में मिसलिनीयम इक्सपेंसेस के रूप में रखा जाता है और कंपनी को हुआ घाटा बैलेंस शीट के बाई ओर लिख जाता है।
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